Monday, September 12, 2011

गीता - आत्मगीता - अध्याय 3 - कर्मयोग (हिन्दी भाष्य ) / भाष्यकार प्रो बसन्त प्रभात जोशी



जो अज्ञानी मनुष्य समस्त इन्द्रियों को बलपूर्वक जबरदस्ती से रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता है; जैसे भूख लगती है खाना भी चाहता है और उपवास का ढोंग करे। स्त्री का चिन्तन करे और जबरन ब्रह्मचारी बने। यह आचरण मिथ्या है। ऐसा मनुष्य मूढ़ है              

                                            आत्म गीता -  भाष्यकार -  प्रो. बसन्त प्रभात जोशी

                                                               अथ तृतीयोऽध्यायः


अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ।1।

अर्जुन बोले, हे श्री कृष्ण यदि आप कर्म की अपेक्षा ज्ञान को श्रेष्ठ  मानते हैं तो फिर किस कारण वश इस भंयकर युद्ध कर्म में, जहाँ स्वजनों के ही साथ युद्ध होना है, क्यों लगाते हैं?

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌ ।2।

हे भगवन, आपके मिले जुले वचनों से मेरी भ्रमित बुद्धि और भी भ्रमित हो गयी है। मुझे कुछ भी रास्ता नहीं सूझ रहा है अतः एक बात निश्चित करके बताइए जिससे मैं कल्याण के मार्ग पर चल सकूं।

श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्‍ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌ ।3।

हे निष्पाप अर्जुन, इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले बताई गई हैं उनमें सांख्य मार्ग के अनुयायी की निष्ठा ज्ञान योग से है अर्थात सभी गुणों का कारण प्रकृति है अतः मन, बुद्धि, अहंकार से शरीर की क्रियाओं में अहम् भाव का त्यागकर आत्मरत होते हुए परमतत्व की खोज करना, परमतत्व को जानना उसमें स्थित रहना सन्यास अथवा साँख्य योग है। परन्तु जिन योगियों की निष्ठा कर्म योग से है वे फल और आसक्ति को त्यागकर समस्त कर्म एवं कर्मफल प्रभु के निमित्त करते हुए
निष्काम कर्म योग का आचरण करते हैं।

न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ।4।

मनुष्य यदि समस्त कर्मों को प्रारम्भ किए बिना ज्ञानी की तरह निष्काम बनने का प्रयत्न करे तो सम्भव नहीं है। इसी प्रकार सभी कर्मों को त्याग दे और कर्म शून्य बन जाय यह भी नहीं हो सकता क्योंकि विहित कर्म आवश्यक है तथा कर्म स्वाभाविक रूप से होते हैं। कर्म पलायन कर्म त्याग नहीं है।

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ।5।

कोई भी मनुष्य किसी भी क्षण बिना कर्म के नहीं रह सकता सभी प्राणी प्रकृति बाध्य हैं। सांस लेना सांस छोड़ना, सुनना देखना, चलना फिरना, उठना बैठना, शौच आदि सभी स्वाभाविक रुप से होने वाले कर्म हैं । कोई भी मनुष्य या प्राणी स्वाभाविक कर्मों का त्याग नहीं कर सकता है।

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ।6।

जो अज्ञानी मनुष्य समस्त इन्द्रियों को बलपूर्वक जबरदस्ती से रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता है; जैसे भूख लगती है खाना भी चाहता है और उपवास का ढोंग करे। स्त्री का चिन्तन करे और जबरन ब्रह्मचारी बने। यह आचरण मिथ्या है। ऐसा मनुष्य मूढ़ है।

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ।7।

ज्ञानी पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ सभी इन्द्रियों से स्वाभाविक कर्म करता है, संसार के भोगों को त्यागते हुए भोगता है, संसार में निर्लिप्त हो कर्म करता है। ऐसा कर्म योगी संसार के सभी कर्मों को शौचादि कर्म की तरह मन में स्थान नहीं देता है तथा कर्मों को स्वाभाविक समझ कर अनासक्त हो कर्म करता है।

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ।8।

सुस्पष्ट है कर्म रहित होना असम्भव है अतः तू शास्त्र सम्मत कर्म कर क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है शरीर संचालन भी बिना कर्म के नहीं हो सकता है।

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ।9।

यज्ञ ईश्वर निर्मित कर्म को कहते हैं, यज्ञ स्वधर्म आचरण को कहते हैं। स्वधर्म ही स्वभाव है। ईश्वर के निमित्त कर्मों के अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा मनुष्य कर्मों से बंधता है। अतः आसक्ति रहित होकर सभी कर्मों को ईश्वर अर्पण करता हुआ कर्म कर। सहज स्वाभाविक कर्म जो उसे उसकी प्रकृति से मिले हैं को छोड़ दूसरे कर्मों में लगा मनुष्य कर्मों में बंधता है अतः हे अर्जुन, आसक्ति रहित होकर स्वाभाविक कर्म कर।

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः ।
अनेनप्रसविष्यध्वमेषवोऽस्त्विष्टकामधुक्‌ ।10।

प्रजापति ब्रह्मा जी ने सृष्टि के आदि में स्वभाव सहित प्राणियों को रचकर कहा कि अपने अपने स्वभाव के आधार पर कर्म करते हुए तुम वृद्धि को प्राप्त हो। तुम्हारा स्वभाव तुम्हें तुम्हारे स्वभावानुसार इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो अर्थात स्वधर्म आचरण बिना आडम्बर के निष्काम भाव से करना है। बाहरी दिखावे के लिए अथवा दूसरे के स्वभाव से प्रभावित होकर आचरण मत करना क्योंकि दूसरे के स्वभाव में तुम उलझ जावोगे तथा अनासक्त आचरण नहीं हो पावेगा।

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।11।

स्वधर्म पालन स्वभाव में रहते हुए करते हुए तुम समस्त देवताओं का पूजन करो। गुरूदेव, मातृदेव, पितृदेव, अतिथि देव, का पूजन करो और वह सभी देव तुम्हें उन्नत करें। इस प्रकार परस्पर एक दूसरे को उन्नत करते हुए कल्याण को प्राप्त हो।

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः ।12।

स्वधर्म पालन स्वभाव से रहते हुए करते हुए सभी दैव तुम्हारी पूजा स्वीकार कर तुम्हें इच्छित भोग देंगे अर्थात तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करेंगे और जो भी भोग देव कृपा से प्राप्त हों उसे जो मनुष्य उन्हें अर्पित किये हुए बिना भोगता है, वह चोर है। यह सम्पूर्ण सृष्टि जीव मय है, जीव स्वयं अधिदैव है। यह जहाँ है वहाँ चैतन्य है। कहीं यह प्रकट रूप में कहीं अप्रकट रूप में है। सभी कुछ ईश्वर का प्रसाद है, सभी में वही ईश, जीव रूप में व्याप्त है, वही दैव है, वही अधिदैव है, यह समझकर सभी भोग सभी भूतों को अर्पित करते हुए देव यजन करना तथा स्वभाव में स्थित रहना परम कल्याण कारक बताया है।

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌ ।13।

यज्ञ से बचे अन्न का सेवन करने वाले मनुष्य अर्थात स्वभावगत कर्मों के आचरण करते हुए सभी देवों यथा माता, पिता, गुरु ,अतिथि आदि तथा सभी भूतों को तृप्त करता हुआ अन्न का सेवन करने वाले मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा जो पापी लोग अपना शरीर पोषण के लिए भोजन कमाते व पकाते हैं, वह पाप को खाते हैं अर्थात स्वभाव गत कर्म करते हुए अपने कमाये अन्न से सभी जीवों को तृप्त करते हुए भोजन करना चाहिए । इसी यज्ञ से ईश्वर संतुष्ट होते हैं, इसी से हरि बोध मयी दृष्टि उत्पन्न होती है । लोक कल्याण परहित ही देव पूजन है, क्योंकि सभी भूतों में जीव अधिदैव के रूप में स्थित है।

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ।14।

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌ ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌ ।15।

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है और वर्षा यज्ञ से होती है अर्थात वर्षा स्वभावानुसार होती है वर्षा होना प्रकृति का नियम है। स्वभाव कर्म से उत्पन्न होता है। कर्म ज्ञान शक्ति से उत्पन्न होता है और ज्ञान अक्षर ब्रह्म अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न होता है। इससे सिद्ध होता है परम अक्षर परमात्मा सदा यज्ञ (स्वभाव) में प्रतिष्ठित है।

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ।16।

हे पार्थ जो मनुष्य संसार में इस प्रचलित सृष्टि चक्र के अनुसार नहीं चलता है अर्थात स्वभाव के विपरीत आचरण करता है या कहें स्वधर्म पालन नहीं करता वह इन्द्रियों द्वारा नित नवीन भोगों में लगा पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ।17।

जो पुरुष आत्मा में रमण करता है आत्मा में ही तृप्त है और आत्म बोध से संतुष्ट है वह कर्म करता हुआ भी कर्म नहीं करता इसलिए उसके लिए कोई कर्तव्य, कर्म नहीं है।

संजय उवाच:
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ।18।

अपने स्वरुप में स्थित हो जाने पर उस पुरुष का न कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है न कर्म न करने से प्रयोजन रहता है। उसका सभी प्राणियों से किसी प्रकार का कोई स्वार्थ सम्बन्ध भी नहीं रहता है।

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ।19।

अतः फल की आसक्ति को त्यागकर कर्तव्य कर्म को कर क्योंकि अनासक्त (फल की इच्छा से रहित) होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परम आत्मतत्व को प्राप्त होता है।

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ।20।

राजा जनक आदि महापुरुष कर्म का अंश भर भी त्याग न करके परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। लोक आचरण को देखते समझते हुए भी तू कर्म करने योग्य है क्योंकि जैसा श्रेष्ठ जन आचरण करते हैं संसार उसी प्रकार चलता है अथवा आचरण करता है।

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।21।

श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, संसार भी उसी का अनुसरण करते हुए चलता है । उनका आचरण अन्य लोगों को शिक्षा देता है, वह जो कुछ निश्चित कर देते हैं मनुष्य समुदाय उसी प्रकार आचरण करने लगता है।

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ।22।

अर्जुन को अपना परम प्रिय जानकर अपने ऐश्वर्य एवं प्रभाव को बताते हुए लोकहित में कर्म की महत्ता को समझाते हैं कि हे अर्जुन मुझे तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो मुझे अप्राप्त है, फिर भी मैं लोकहित के लिए कर्म करता हूँ।

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।23।

यदि मैं सावधानी पूर्वक लोक हित में कार्य न करूं तो लोगों में  इस का संदेश गलत जाएगा, क्योंकि मनुष्य मेरे मार्ग का अनुसरण करते हैं। अतः मैं लोक हित में कर्म उसी प्रकार करता हूँ जिस प्रकार सकाम पुरुष कर्म करते हैं।

यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्‌ ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ।24।

यदि मैं लोक हित में कर्म न करूं और कर्मों से उदासीन हो जाऊँ तो मेरे व्यवहार को देखते हुए अन्य लोग भी मेरी तरह ही आचरण करेंगे और कर्म नहीं करेंगे परिणाम स्वरूप संसार नहीं चलेगा। अतः कर्म त्याग उचित नहीं है।

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्‌ ।25।

फल की इच्छा रखने वाले अज्ञानी मनुष्य जिस प्रकार कर्म करते हैं अनासक्त ज्ञानी पुरुष को भी लोक कल्याण को देखते हुए सकाम पुरुष की तरह कर्म करना चाहिए।

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम्‌ ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्‌ ।26।

परमात्मा में जिसका चित्त लगा है ऐसे ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह आसक्त होकर कर्म करने वाले अज्ञानी पुरुषों की बुद्धि को न भटकाये, उसमें भ्रम पैदा न करे। बल्कि स्वयं भी सभी कर्म करता हुआ उनसे वैसा करवाये। सकामी मनुष्य जिन्हें ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है अपने स्वभाव वश कर्म में लगे रहते हैं, ऐसे अनाधिकारी मनुष्यों को निष्कामता का उपदेश बेकार है। कच्ची बुद्धि होने के कारण वह अपने स्वाभाविक धर्म से भटक सकते है।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।27।

सभी कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा किये जाते हैं अर्थात सत्त्व,रज और तम की विभिन्न मात्रा के अनुसार प्रत्येक प्राणी अलग अलग स्वाभाविक कर्म करता है परन्तु अहंकार के कारण अज्ञानी जीवात्मा स्वयं को कर्ता मानता है और कर्म बन्धन में फॅसता है।

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ।28।

ज्ञान योगी गुण विभाग और कर्म विभाग के तत्व को जानता है। सम्पूर्ण गुण गुणों में वर्तते हैं, ऐसा समझकर वह आसक्त नहीं होता है। संसार की समस्त जड़ प्रकृति तीन गुणों से रचित है, सभी में तीन गुण समाये हुए हैं। पंचमहाभूत, आकाश, वायु अग्नि, जल, पृथ्वी सभी में तीन गुण कम या अधिक मात्रा में समाये हैं। मन, बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियां भी तीन गुणों के कम अधिक मात्रा के आधार पर भिन्न भिन्न चेष्टा करती हैं। आत्मा
सदा निर्लिप्त और गुणातीत है अतः ज्ञानी गुणों से आसक्त नहीं होते हैं। वह हमेशा साक्षी भाव से गुणों को देखते हैं।

प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌ ।29।

अज्ञानी पुरुष प्रकृति के गुणों से मोहित हुए गुण व कर्मों में आसक्त रहते हैं और सदा कर्म बन्धन में फॅसे रहते हैं। ज्ञानी पुरुष इन अज्ञानी मनुष्यों को स्वभाव वश लगे हुए कर्मों से विचलित न करे क्योंकि कर्म आसक्त किसी भी सामान्य अथवा अज्ञानी मनुष्य के समझ में जड़ व चेतन प्रकृति का खेल नहीं आ सकता है

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ।30।

तू समस्त कर्मों को मुझमें अर्पित कर दे तथा अपनी चित्त वृत्ति को सदैव आत्म स्वरूप में लगाये रख । कर्तापन को छोड़कर बिना फल की आशा के, ममता रहित और संताप रहित होकर युद्धकर। आत्म स्वरूप में स्थित होकर यह समझ ले कि तू  अविनाशी, अव्यक्त आत्मा है, तू विकार रहित है अतः निमित्त मात्र युद्ध कर।

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः ।31।

जो मनुष्य मेरे इस मत में दोष नहीं देखते हैं तथा श्रद्धायुक्त होकर आदर पूर्वक इस मत के अनुसार चलते हैं वह कर्म बन्धन से छूट जाते हैं।

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌ ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ।32।

जो मनुष्य मेरे इस मत में दोष दृष्टि रखते हैं तथा इस मत के अनुसार नहीं चलते, जिनका चित्त भिन्न भिन्न अनेक साँसारिक ज्ञानों से मोहित है, उन्हें तू नष्ट हुआ समझ अर्थात वे कभी भी आत्मतत्व को नहीं पा सकते।

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ।33।

सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते है अर्थात सत्त्व, रज, तम की मात्रा के अनुसार चेष्टा करते हैं। ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा। चेष्टाएं स्वाभाविक रुप से होनी हैं फिर उन्हें क्यों हठ पूर्वक बढ़ाया जाय। अतः अधिक परिश्रम करके दिन रात काम करते हुए भोग प्राप्त करने की विशेष चेष्टा (हठ) बुद्धिमानी नहीं है।

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ।34।

प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए हैं, इन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए अन्यथा मकड़ी की तरह स्वयं अपने जाल में जीव फॅस जाता है। ये दोनों कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले शत्रु हैं अतः राग और द्वेष को हृदय में स्थान नहीं देना चाहिए।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌ ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।35।

दूसरे के धर्म से गुण रहित अपना धर्म (स्वभाव) अति उत्तम है। दूसरे का धर्म (स्वभाव) यद्यपि श्रेष्ठ हो या दूसरे के धर्म (स्वभाव) को भली प्रकार अपना भी लिया जाय तो भी उस पर चलना अपनी सरलता को खो देना है क्योंकि हठ पूर्वक ही दूसरे के स्वभाव का आचरण हो सकता है, अतः स्वाभाविकता नहीं रहती। अपने धर्म (स्वभाव) में मरना भी कल्याण कारक है दूसरे का स्वभाव भय देने वाला है अर्थात तुम्हारे अन्दर सत्त्व, रज, तम कीमात्रा के अनुसार तुम्हारा जो स्वाभाविक स्वभाव है उसका सरलता पूर्वक निर्वहन करो।

अर्जुन उवाचः
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ।36।

अर्जुन बोला:- हे कृष्ण, फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी बलपूर्वक लगाए हुए की तरह किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है। साधारण मनुष्य गलत रास्ते पर चले तो समझा जा सकता है परन्तु विद्वान व्यक्ति भी गलत रास्ते पर चले जाते हैं।

श्रीभगवानुवाच

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌ ।37।

श्री भगवान बोले:- रजोगुण से जन्म लिए काम और क्रोध ही मनुष्य को पाप की ओर ले चलते हैं। यह बहुत खाने वाले हैं और कभी तृप्त नहीं होते हैं। यह बड़े पापी हैं तथा आत्मोन्नति के मार्ग में यह प्रबल शत्रु हैं।

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्‌ ।38।

जिस प्रकार धुएं से अग्नि ढकी रहती है तथा दर्पण मैले से ढक जाता है, जेर से गर्भ ढका रहता है उसी प्रकार ज्ञान हमेशा काम-क्रोध से ढका रहता है।

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ।39।

हे अर्जुन, अग्नि के समान सदैव असंतुष्ट यह काम, जो सदा ज्ञानियों का प्रबल शत्रु है उन्हें भटकाता रहता है।

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्‌ ।40।

यह काम क्रोध इन्द्रिय मन बुद्धि में सदा बैठे रहते हैं यहाँ बैठकर यह सदैव नित्य शुद्ध ज्ञान को ग्रहण की तरह आच्छादित कर जीवात्मा को मोहित करते हैं।

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्‌ ।41।

इसलिए हे अर्जुन, काम क्रोध के मूल स्थान इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम क्रोध को बल पूर्वक मार डाल।

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ।42।

स्थूल शरीर से इन्द्रियां बलवान और सूक्ष्म हैं, इन्द्रियों से मन अधिक शक्तिशाली है, मन से भी परे बुद्धि है और जो बुद्धि से भी परे है अर्थात बुद्धि से शक्तिशाली है तथा बुद्धि द्वारा नहीं पकड़ा जा सकता वह आत्मा है।

एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्‌ ।43।

इस प्रकार बुद्धि से अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जान कर बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे अर्जुन, इस काम, क्रोध रुपी प्रबल शत्रुओं को मार डाल।
         
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥3
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