Friday, September 16, 2011

गीता - आत्मगीता - अध्याय ८ - अक्षर ब्रह्मयोग (हिन्दी भाष्य )

अर्जुन उवाच

 

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ।1

 

अर्जुन बोले, हे श्री कृष्ण, ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, कर्म क्या है, अधिभूत क्या और अधिदैव किसको कहते हैं।

 

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ।2।

 

हे मधुसूदन अधियज्ञ किसे कहते हैं तथा इस देह में उसका क्या स्थान है और जो आपके आत्म रूप में नित्य युक्त चित्त पुरुष हैं उन्हें मृत्यु के समय आपका स्वरूप किस प्रकार जानने में आता है?

 

 

श्रीभगवानुवाच

 

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ।3।

 

श्री भगवान अर्जुन को बताते हुए कहते हैं, परम अक्षर अर्थात जिसका कभी नाश नहीं होता वह निराकर रहे अथवा देह धारण करे वह सदा नित्य रहता है। ब्रह्म स्वभाव अध्यात्म के नाम से जाना जाता है। ब्रह्म की अपरा(जड़) और परा (जीव) प्रकृति ही उसका स्वभाव है। इसी प्रकार जीव का स्वभाव ही उसका स्वधर्म है। अव्यक्त जो जीव है, आत्मा है, विश्वात्मा है में बिना किसी कर्ता के प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला जो आकार उत्पन्न करने का कार्य चलता जा रहा है, उसे कर्म कहते हैं, इसी प्रकार जो प्राणियों के भावों को उत्पन्न करे वह कर्म है।

 

 

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌ ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।4।

 

सब उत्पत्ति विनाश वाले पदार्थ अधिभूत हैं जैसे मनुष्य शरीर अधिभूत है। मनुष्य की बुद्धि अहंकार मन आदि भी अधिभूत हैं। पृथ्वी, जल अग्नि, वायु, आकाश भी अधिभूत हैं। जीवात्मा अधिदैव है। इसे हिरण्यमय पुरुष भी कहा गया है। इसे सूत्रात्मा के रूप में भी जाना जाता है। हे अर्जुन, मैं इस शरीर में अधियज्ञ हूँ अर्थात विशुद्ध आत्मा,विश्वात्मा मैं ही हूँ। इस शरीर में परमात्मा अधिदैव और अधियज्ञ दोनों रूप से प्रतिष्ठित हैं। अधिदैव के रूप में वह कर्ता भोक्ता है तो अधियज्ञ के रूप में दृष्टा।

 

 

अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌ ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ।5।

 

हे अर्जुन, मृत्यु के समय भी जो मुझ अधियज्ञ परमेश्वर को स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है वह स्वयं अधियज्ञ स्वरूप विश्वात्मा हो जाता है। यथा मति तथा गतिके नियम की पुष्टि की है। जो समझ जाता है कि देह नष्वर है, जीवात्मा ब्रह्म ही है, भ्रम वश और कर्म वश आत्मा (ब्रह्म) को जीव भाव की प्राप्ति हुयी है, वह स्वयं अपने देह में बैठे साक्षी आत्मतत्व में स्थित होकर रमण करते हुए, इस शरीर को त्यागते हुए आत्म स्वरूप हो जाता है क्योंकि उसके कर्म साक्षी भाव से स्थित रहने के कारण नष्ट हो जाते हैं।

 

 

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌ ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ।6।

 

हे अर्जुन मृत्यु के समय जो जिस जिस भाव का स्मरण करता है, देह को त्यागकर उसी भाव को प्राप्त होता है। मरने के समय जिस विषय में बुद्धि स्थित होती है तदनुसार मरणोपरान्त गति प्राप्त होती है। देह बुद्धि है तो देह प्राप्त होगा। इसी प्रकार जिस कर्म में बुद्धि है, देह प्राप्त कर वह कर्म होगा। आत्म बुद्धि है, तो आत्म स्वरूप को प्राप्त होगा।

 

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌ ।7।

 

अतः हे अर्जुन, तू हर समय मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर अर्थात हमेशा जाग्रत भाव से साक्षी स्वरूप आत्मा द्वारा सभी कर्मों को देखता हुआ कर्म कर। कर्म देखते हुए करेगा तो वह कर्म स्वतः निष्काम होता जायेगा क्योंकि साक्षी भाव के कारण कर्ता भाव या जीव भाव समाप्त हो जायेगा और शुद्ध  आत्मा भाव या ब्रह्म भाव रहेगा। मुझमें अर्पित मन बुद्धि से तू मुझ आत्म रूप में स्थित होकर मुझे (आत्मतत्व को) प्राप्त होगा।

 

 

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्‌ ।8।

 

हे पार्थ, निरन्तर अभ्यास करते हुए जो आत्मतत्व से जुड़ जाता है अर्थात आत्म योग युक्त हो जाता है तथा लगातार आत्मरत रहता है, इधर उधर उसका मन नहीं भटकता, ऐसा योगी निरन्तर चिन्तन द्वारा आत्मरत हुआ परम दिव्य पुरुष (आत्म स्वरूप) को प्राप्त होता है। आत्मरत हुआ वह स्वतः आत्मा, विश्वात्मा हुआ पर ब्रह्म परमात्मा हो जाता है।

 

 

कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌ ।9।

 

जो परमात्मा परमाणु से भी अत्यन्त सूक्ष्म है अर्थात आकार रहित है, सर्वज्ञ है, इस सृष्टि का मूल है, अनादि है, जिससे संसार के सभी चर अचर अनुशासित होते हैं, जो सबकी उत्पत्ति का कारण है, जो सबका धारण पोषण करने वाला है, जो नित्य चैतन्य है, जिसका चैतन्य सूर्य के समान अपनी चेतना से सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित कर रहा है, जहाँ अज्ञान का अंश मात्र भी नहीं ऐसे परम परमात्मा का जो पुरुष सदा स्मरण करता

 

प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्‌- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्‌ ।10।

 

वह स्वरूप स्थिति पुरुष अन्त काल में भी योग बल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके अर्थात सम्पूर्ण चिन्तन भौंहों के मध्य में स्थित करके ध्यानस्थ हो, न डिगने वाले मन से दिव्य आत्म स्वरूप पर ब्रह्म का स्मरण करता हुआ उससे तदाकार हो जाता है। इस विषय में महत्वपूर्ण बात यह है कि विचार और क्रिया पर प्राण वायु की गति कम और अधिक होती है, विचार रूकते ही प्राण रूक जाता है और किसी एक स्थान पर विचार केन्द्रित करने पर प्राण उस स्थान पर केन्द्रित हो जाता है।

 

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ।11।

 

जिस परमात्मा को ज्ञानीजन अक्षर अर्थात जिसका कभी नाश नहीं होता है, कहते हैं; जिस दुर्लभ पद में कामना रहित होकर, यत्नशील सन्यासी और निष्काम कर्म योगी प्रवेश करते हैं अर्थात परमात्मा से तदाकार होकर उसका स्वरूप हो जाते हैं, जिस परम पद की इच्छा वाले सदा ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, वह परम पद कैसा है? कैसे प्राप्त होता है? उसे हे अर्जुन तू ध्यान पूर्वक सुन।

 

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्‌ ।12।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्‌ ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्‌ ।13।

 

इन्द्रियों के द्वारों को बन्द करके मन को हृदय  हृदय द्वारा रोककर, प्राण को मस्तक  में स्थापित करे। मन को हृदय से रोकना  क्या है? यह सूत्र ध्यान की कुंजी है मन का अर्थ है विचारों के संघर्ष का केंद्र मनुष्य के लिए यह किस प्रकार सम्भव है की वह मन द्वारा मन को वश में करे इसलिए श्री कृष्ण कहते हैं मन को हृदय द्वारा निरुद्ध करे यहाँ हृदय का मतलब मनोवैज्ञानिक ह्रदय से है जहाँ कोई संघर्ष नहीं होता है यह भौतिक हृदय के दायीं और छाती के बीचों बीच होता है कुण्डलिनी योग की भाषा में इस मनोवैज्ञानिक हृदय स्थल को अनाहत चक्र कहते हैं मनुष्य के पास ऐसा क्या है जहाँ कोई संघर्ष न हो? वह है मनुष्य की शुद्ध बुद्धि शुद्ध बुद्धि होते ही इन्द्रियाँ भटकना बंद कर देती हैं, उनकी वृत्ति समाप्त हो जाती है और मन संघर्ष रहित होकर शांत हो जाता है कुण्डलिनी योग में वर्णित अनाहत चक्र के नीचे के चक्रों में अशुद्ध  और सांसारिक बुद्धि होती है अनाहत चक्र और इसके ऊपर बुद्धि शुद्ध होती है और अनाहत चक्र या ह्रदय स्थल से नीचे के चक्रों में मन का नियंत्रण है जहाँ बुद्धि मिश्रित और अशद्ध  होने से सदा संघर्ष रहता है. इस स्पष्टीकरण  से तात्पर्य है कि साधक द्वारा मन को जहाँ केवल संघर्ष है, ऐसी संघर्ष युक्त  बुद्धि को, शुद्ध बुद्धि में लय करना आवश्यक है इससे पहले कोई भी कभी भी साधक ध्यान में स्थित नहीं हो सकता है शुद्ध बुद्धि से नियंत्रित किया गया मन स्वतः शांत हो जाता है

अब कृष्ण कहते हैं अब प्राण अर्थात जीवन शक्ति को को मस्तक में स्थापित करे जैसे ही शुद्ध बुद्धि द्वारा पकड़ा हुआ मन संघर्ष रहित होकर शांत हो जाता है, उस समय एक अद्धभुत  शक्ति उत्त्पन्न होती है जिसे हम कुण्डलिनी  शक्ति के नाम से जानते हैं इस शक्ति को मस्तक में धारण करे इसके मस्तक में पहुंचते ही योग हो जाता है जब यह कुण्डलिनी शक्ति मस्तक में पहुँच जाती है तब साधक को सत्य का ज्ञान हो जाता है और वह उस सर्वोच्च दिव्यसत्ता का अनुभव करता है. वह साधक जब सत्य की अनुभूति कर लेता है तब वह जान जाता है कि मैं ही ओंकार हूँ, मैं ही ब्रह्म हूँ, मैं ही हूँ और इस सत्य जागृति को वह जीवन पर्यन्त सदा अनुभव करता है, जब जागृति में ही अपनी इच्छा अनुसार अपने देह का त्याग करता है और सर्वोच्च सत्ता से तदाकार हुआ हमेशा उस गति को अर्थात उस अवस्था को अनुभव करता है

सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक है कि बुद्धि क्या है? लोग मन को ही बुद्धि समझते हैं मन तीन शक्तियों से निर्मित होता है, यह हैं अज्ञान, विक्षेप शक्ति और बुद्धि. मन में अज्ञान और विक्षेप शक्ति बुद्धि का हरण कर लेते हैं. सरल भाषा में मन वह है  जो या तो पिछला सोचता है या आगे की सोचता है यह हमेशा सोचता है यहाँ बुद्धि सदा भ्रमित रहती है. बुद्धि वह है जो पिछला देख सकती है, वर्तमान देखती है और उच्च स्तर पर भविष्य भी देखती है प्रश्न यह है कि हमारा सामजिक ढांचा मन का विकास करता है और जब समझ आती है तब तक आयु का बड़ा हिस्सा निकल जाता है फिर भी निरीक्षण करते हैं कि बुद्धि किस प्रकार विकसित की जाय या बुद्धि में किस प्रकार टिका जाय सामान्य उत्तर तो यह है कि अज्ञान और विक्षेप शक्ति का नाश कर दिया जाय पर क्या यह सरल है? हम यहाँ सरल उपाय खोजेंगे 1-भोजन सरल और सात्विक हो जो आयु और स्वास्थ्य  बढ़ाने वाला करना चाहिए न अधिक खाना चाहिए न भूखा रहना चाहिए. संतुलित भोजन करना पहला कार्य है प्रति दिन स्नान और शरीर की सफाई, नियमित रूप से घूमना तथा व्यायाम या योगासन और प्राणायाम करना चाहिए 2-प्रति दिन अच्छा स्वाध्याय करना, भजन सुनना और भजन करना चाहिए. 3-अकारण नहीं  बोलना, कोई भी चेष्टा अकारण न करना, अकारण कर्म न करना. दूसरे की निंदा, चुगली से बचना. आडम्बर न करना, पाखण्ड नहीं करना चाहिए 4- सभी मनुष्यों चाहे वह गरीब हो, अमीर हो, छोटा हो बड़ा हो, सबका आदर करना. पशु ,पक्षियों  और वनस्पति जगत से से प्रेम और आदर करना जड़ प्रकृति के प्रति भी आदर भाव होना चाहिए. 5- हृदय में सब प्राणियों के प्रति करुणा रखना 6-एक वैज्ञानिक का स्वाभाव रखना जो नई वस्तु खोजता है 6-प्रति दिन जितना हो सके अपने मस्तक में दोनों भोंहों के मध्य अपने को स्तिथ करना इससे विक्षेप शक्ति का नाश होता है. यह उपाय इतने सरल हैं  कि कोई भी मनुष्य कर सकता है, तभी बुद्धि विकसित होगी और मन शांत होकर स्थिर हो जाएगा

 

 

 

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ।14।

 

हे अर्जुन, इसलिए जो पुरुष अनन्यता से सदा आत्मरत हैं, सदा आत्म चिन्तन करता है, (यही पुरुषोत्तम परमात्मा का चिन्तन है) उस नित्य निरन्तर आत्मरत योगी के लिए मैं आत्मतत्व सहज ही सुलभ हूँ।

 

 

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्‌ ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ।15।

परम सिद्धि को पाकर अर्थात आत्म स्थित होकर स्वरूप लाभ प्राप्त कर महात्मा जन ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं और ब्रह्म योगी पुनः पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते अर्थात उनका देह धारण व देह त्याग उनकी इच्छा से होता है। वह जन्म नहीं लेते वह प्रकट होते हैं। पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध यह योगी पुरुष माया के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।

 

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ।16।

 

हे अर्जुन, ब्रह्मा जी के लोक तक जितने भी लोक हैं सबका समय निश्चित है। सभी पुनर्जन्म के चक्र में जकड़े हैं। केवल मुझे प्राप्त होकर अर्थात जो आत्म स्वरूप होकर अपने को मुझमें लीन कर देता है, वह देह धारण व देह त्याग के बन्धन से मुक्त हो जाता है। अनाहत चक्र तक जिस स्थान में चिन्तन होता है तदनुसार जीव की गति होती है, यहाँ तक जीव माया के बन्धन में रहता है, वह परवश होकर जन्म मृत्यु के चक्र में फंसा रहता है। चिन्तन जब भृकुटि के मध्य होकर आत्म स्वरूप में लय हो जाता है तो माया बन्धन से मुक्त हो जाता है उसका माया के द्वारा आवागमन समाप्त हो जाता है वह निज इच्छा से ही प्रकट होकर देह धारण करता है।

 

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ।17।

 

ब्रह्मा जी के दिन-रात्रि के विषय में बताते हुए श्री भगवान कहते हैं, कि ब्रह्मा जी का एक दिन एक हजार चतुर्युगी अवधि का होता है अर्थात सतयुग 1,72,8000 वर्ष + त्रेता 12,96,000 वर्ष + द्वापर 8,64,000 वर्ष + कलियुग 4,32,000 वर्ष गुणा 1000 वर्ष = कुल 4,32,00,00,000 वर्ष। इसी प्रकार एक रात्रि 4,32,00,00,000 वर्ष की होती है। इस प्रकार जो पृथ्वी की कुल आयु को जानते हैं वह काल तत्व को जानते है। इस गणना के आधार पर यदि एक दिन (12 घण्टे) के आधार पर गणना की जाय तो पृथ्वी की कुल आयु 4,32,00,00,000 निश्चित है। यदि रात दिन (24 घण्टे) की अवधि के आधार पर पृथ्वी आयु मानी जाए तो यह 8,64,00,00,000 वर्ष निश्चित है।

 

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ।18।

 

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ।19।

 

ब्रह्मा जी के दिन के प्रारम्भ होते ही अव्यक्त अर्थात निराकार सूत्रात्मा से चराचर भूत गण उत्पन्न होते हैं और जब रात्रि होती है तब उसी अव्यक्त सूत्रात्मा में सभी भूत लीन हो जाते हैं, पुनः माया (प्रकृति) के वश हुए रात्रि में प्रवेश तथा दिन के आगमन पर पुनः उत्पन्न होते हैं अर्थात परमात्मा की जीव शक्ति ही जन्म और लय का कारण है।

 

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ।20।

 

परन्तु उस अव्यक्त जीवात्मा से भी अव्यक्त (आत्मा, ब्रह्म,

परमात्मा) है, वह समस्त भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता अर्थात सभी जीवात्मा सहित ब्रह्मा जी भी उसी अव्यक्त परमात्मा में समा जाते हैं।

 

 

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌ ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।21।

 

अव्यक्त परमात्मा अक्षर कहा जाता है। अव्यक्त शब्द से परमात्मा के विषय में कुछ नहीं जाना जाता उसे जानने के लिए उसे अक्षर अर्थात जिसका नाश नहीं होता है कहा गया। इसी अव्यक्त की प्राप्ति परम गति है। इसे स्वरूप स्थिति भी कहते हैं। इसे ही आत्म स्थित होना विश्वात्मा होना भी कहा है। यही ब्राह्मी स्थिति भी है। यह वह स्थिति है जिसे प्राप्त कर माया के बन्धन से मुक्ति मिल जाती है। प्रकृति द्वारा उसका जन्म-मृत्यु नहीं होती बल्कि वह स्वयं वह अपने कारण हो जाते हैं। इसी परम स्थिति को परमात्मा का स्थान कहा गया है।

 

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्‌ ।22।

 

हे अर्जुन जिस अव्यक्त परमात्मा के अन्दर ब्रह्मा जी सहित समस्त जीव और समस्त प्रकृति स्थित हैं, जो परमात्मा इस सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त है, वह पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है। अनन्यता अर्थात निरन्तर यत्न, अभ्यास करना, स्वरूप अनुसंधान को भक्ति कहते हैं। मैं कौन हूँ ? आत्म तत्व की खोज करना। इसके लिए निरन्तर परमात्मा के नाम ऊँका सदा व्यवहार में स्मरण करना। मन बुद्धि चित्त को सदा प्रयत्न करके परमात्मा में लगाना। सदा उसका चिन्तन करना, उसी के लिए कर्म करना भक्ति है। हमेशा जाग्रत भाव से संसार और समस्त क्रियाओं का देखना, साक्षी भाव से हमेशा परमात्मा को अनुभव करना आदि जिस किसी माध्यम से स्वरूप अनुभूति हो।

 

 

 

यत्र काले त्वनावत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ।23।

 

यहाँ मृत्यु के बाद जीव की गति का रहस्य बताते हुए भगवान श्री कृष्ण चन्द्र, अर्जुन से कहते हैं, जिस काल में शरीर त्याग कर योगी ब्रह्म स्वरूप होकर आवागमन से मुक्त हो जाते हैं अर्थात माया के और बन्धन को तोड़ डालते हैं और जिस काल में फिर से माया के चक्र में फंसे कर्म बन्धनों के फलस्वरूप वापस लौटते हैं, उन दोनों स्थितियों को मैं तुझे बताता हूँ।

 

 

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ।24।

 

जो योगी ज्योति, अग्नि, दिन, शुक्ल पक्ष, उत्तरायण, के छह माह में देह त्यागते हैं अर्थात जिन पुरूषों और योगियों में आत्म ज्ञान का प्रकाश हो जाता है, वह ज्ञान के प्रकाश से ज्योर्तिमय, अग्निमय, शुक्ल  पक्ष की चांदनी के समान प्रकाशमय और उत्तरायण के छह माहों के समान परम प्रकाशमय हो जाते हैं अर्थात जिन्हें आत्मज्ञान हो जाता है (उनके ज्ञान की तुलना प्रकाश की मात्रा से की है)। ऐसे आत्मवान विश्वात्मा परमात्मा हुए पुरुष, अव्यक्त हो जाते हैं। स्वयं परम ब्रह्म हो जाते हैं।

 

धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम्‌ ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ।25।

 

धुंआ, रात्रि, कृष्ण पक्ष एवं दक्षिणायन के छह माहों में जो देह त्यागते हैं, वह चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त करके पुनः लौटते हैं अर्थात जिन पुरुषों व योगियों को आत्म ज्ञान नहीं होता उनके अन्दर अज्ञान की स्थिति धुएं, रात्रि, कृष्ण पक्ष एवं दक्षिणायन के छःमाह जैसी तमस युक्त (अज्ञान मय) होती है। वह तमस के कारण अन्ध लोकों अर्थात अज्ञान में भटकते रहते हैं, कालान्तर में उनके सतकर्मों के कारण जो उन्हें चन्द्र ज्योति अर्थात ज्ञान का प्रकाश मिलता है उसके परिणाम स्वरूप इस संसार में पुनः जन्म लेते हैं।

 

 

शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः ।26।

 

इस जगत में दो प्रकार के मार्ग हैं 1 - शुक्ल  मार्ग अर्थात ज्ञान मार्ग जहाँ ज्ञानी देह छोड़ने से पहले आत्म स्थित हो जाता है।

2 - कृष्ण मार्ग जहाँ सकामी योगी व पुरुष शुभ और अशुभ कर्मों के कारण अज्ञान के मार्ग में जाता है तथा ज्ञान का अंश प्राप्त होने पर कर्मानुसार पुनः इस संसार में जन्म लेता है।

 

 

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ।27।

 

इस प्रकार इन दोनों ज्ञान और अज्ञान (आसक्त कर्म) के मार्ग तत्व से जानकर योगी भ्रमित नहीं होता तथा हे अर्जुन, सभी स्थितियों में बुद्धि द्वारा परमात्मा से सदैव जुड़ा रहता है और आत्मरत रहता है। इस प्रकार पूर्ण ज्ञान को स्वतः ही उपलब्ध हो जाता है।

 

 

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्‌ ।
अत्येत तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्‌ ।28।

 

योगी पुरुष ज्ञान और अज्ञान के मार्ग को तत्व से जानकर तथा अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ को भली प्रकार समझते हुए परम अव्यक्त दिव्य पुरूष को जानकर, वेद शास्त्र, ईश्वर निमित्त  कर्म, तप, दान आदि के जो पुण्य फल हैं उन सबका उलंघन कर जाता है, जैसे अपार जलाषय मिलने पर छोटी बावड़ी का प्रयोजन लगभग बेकार हो जाता है, सूर्योदय होने पर दीपक की ज्योति का कोई प्रयोजन नहीं रहता है और परम सनातन स्थिति को प्राप्त होता है

 

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