Tuesday, September 20, 2011

गीता - आत्मगीता - अध्याय १७ - श्रद्धात्रयविभागयोग (हिन्दी भाष्य ) / भाष्यकार प्रो बसन्त प्रभात जोशी



जो मूढ़ता के कारण अथवा अज्ञान से, बुद्धि भ्रम से, हठपूर्वक मन वाणी शरीर को पीड़ा देते हुएi किया जाता है अथवा दूसरों के अनिष्ट के लिए किया जाता है जैसे  जबरन एक टांग पर पानी में खड़े रहकर, कांटों में लेटकर, अग्नि प्रज्वलित कर उसके भीतर घेरे में बैठकर, बाल-दाड़ी नोचकर, मुर्दे पर बैठ कर, शरीर को कष्ट पहुंचाते हुए अथवा जबरन मौन धारण कर, मन से दूसरे को बुरा चाहने वाले, अपने हित व दूसरे को अहित के लिए निरीह पशुओं को काटने वाले लोगों का आचरण तामस तप कहलाता है।

                               
                                  आत्मगीता  -    भाष्यकार- प्रो. बसन्त प्रभात जोशी
                                                                               
 
                                        अथ सप्तदशोऽध्याय श्रद्धात्रयविभागयोग


अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ।1।

अर्जुन बोले, हे श्री भगवान जिस मनुष्य को शास्त्र विधि का ज्ञान नहीं है परन्तु उसके अन्दर श्रद्धा है और श्रद्धा से युक्त होकर पूजन उपासना आदि करते हैं, उनकी स्थिति कौन सी होती है सात्विक, राजसी अथवा तामसी ?

श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु ।2।

श्री भगवान बोले, हे अर्जुन, यह श्रद्धा जीव स्वभाव में उत्पन्न होती है और तीन प्रकार की होती है; सात्विक, राजसी और तामसी। इस का कारण है सभी प्राणी अपरा प्रकृति (माया) के तीनों गुणों से निर्मित होते हैं और प्रकृति के गुण की प्रधानता के कारण जीव की श्रद्धा और कर्म भी होते हैं। प्रकृति के गुण जीवात्मा के संस्कार बनाते हैं उन संस्कारों से मन बनता है, मन से क्रिया बनती है, इस प्रकार जन्म जन्मान्तर का क्रम चलता रहता है और जीवात्मा के तीन गुण से युक्त संस्कार नहीं मिटते इसलिए जिस आत्मा का जैसा गुण वैसे संस्कार वैसी ही श्रद्धा होती है।

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ।3।


हे अर्जुन, जीवात्मा में जो श्रद्धा होती है वह या तो सात्विक होगी, राजसी होगी अथवा तामसी। समस्त प्राणी किसी न किसी श्रद्धा से युक्त है। त्रिगुणात्मक प्रकृति के कारण जिस मनुष्य में जिस प्रकार की श्रद्धा दिखे, उसे उस गुण से युक्त जानना चाहिए। मनुष्य जिस अवस्था अर्थात जिस गुण की वृद्धि में देह त्यागता है, पुनः देह धारण करता है उसकी वृत्ति उस गुण के अनुसार होती है। तमस में देह त्यागने पर श्रद्धा तमोगुणी, इसी प्रकार तमस में जन्म लेने पर श्रद्धा तमोगुणी। इसी प्रकार अन्य गुणों का प्रभाव देखा जाता है। सूर्य, प्रकाश, चन्द्रमा की प्रभा, वर्षा का जल सब वनस्पतियों को बराबर मिलता है पर जो जैसी वनस्पति होती है उसमें वैसे फूल-फल लगते हैं।

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये जयन्ते तामसा जनाः ।4।

सात्विक श्रद्धा वाले पुरुष देव पूजन, यज्ञ, उपासना करते हैं। रजोगुणी पुरुष यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं तथा तमोगुणी भूत प्रेत को पूजते हैं, शमशान साधना, कपाल पूजा आदि करते हैं।

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्‍कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ।5।

जो शास्त्र अनुकूल नियमों को नहीं मानते हुए केवल अपने मन से साधारण अथवा कठिन पूजन, आचरण करते हैं, अपने को कष्ट देते हैं, कई-कई दिन व्रत करते हैं, कोई गड्ढे के नीचे जाते हैं, पेड़ में लटकते हैं, बाल दाड़ी नोचते हैं, दूसरे को पीड़ा देते हैं, पशु बलि, नर बलि देते हैं। यह सभी मनुष्य दम्भ अहंकार से युक्त अनेक सांसारिक भोगों की इच्छा लिए हुए पाखण्ड से इस प्रकार की तुच्छ पूजा आदि कार्य करते हैं।

कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्‌यासुरनिश्चयान्‌ ।6।

इनका इस प्रकार के दम्भ पाखण्ड युक्त आचरण, जो स्वयं को और दूसरे को कष्ट देने वाला है मुझ जीव आत्मा को अपार पीड़ा देते हैं। इनके इस आचरण से भ्रान्ति और मूढ़ता अधिक और अधिक हो जाती है तथा आत्म तत्व पूर्णतया छिप जाता है। ये मूढ़ स्वभाव वाले असुर स्वभाव को धारण किये होते हैं। इनके लिए प्रत्यक्ष ज्ञान और प्रत्यक्ष कार्य ही सब कुछ होता है। इनका आत्मतत्व विस्मृत हो जाता है।

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु ।7।

हे अर्जुन, भोजन भी सबको अपनी प्रकृति के अनुसार प्रिय होता है और यज्ञ, दान, तप भी तीन प्रकार के होते हैं। इनका भेद मैं तुझे बताता हूँ।

आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ।8।

सतोगुणी जीवात्मा को रस युक्त, चिकने, स्थिर रहने वाले अर्थात ताजे जिनका शरीर में प्रभाव देर तक रहता है, जिनसे आयु, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति बढ़ती है, प्रिय लगने वाला भोजन है।

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ।9।

कड़वे जिसमें अम्ल की मात्रा ज्यादा हो अर्थात खट्टे व ज्यादा नमक वाले, बहुत गरम, तीखे, रूखे, जिस खाने से मुंह में, पेट में, जलन हो जाय ऐसा भोजन राजस प्रकृति के लोगों को अच्छा लगता है। इस भोजन से दुःख, चिन्ता और शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं।

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्‌।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्‌ ।10।
जो भोजन तमोगुणी मनुष्य को अच्छा लगता है, उसे सुन। अधपका, रस रहित, जो कच्चा हो, या गर्मी से जिसका रस सूख गया हो, दुर्गन्ध युक्त, बासी और जूठा अपवित्र भोजन तामस प्रवृति के लोगों को अच्छा लगता है।

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ।11।

जो शास्त्र विधि से नियत आत्मतत्व परमात्मा के लिए करना कर्तव्य है, यही परम श्रेय का मार्ग है, यही मेरा परम लक्ष्य है, यह जानकर मन को निश्चित करके बिना किसी फल के अर्थात संसार की आसक्ति, इच्छा को छोड़कर किया जाता है वह सात्विक यज्ञ है।

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्‌।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्‌ ।12।

परन्तु जहाँ स्वभाव में केवल दम्भ हो और पाखण्ड के लिए अथवा फल की इच्छा के लिए अपनी सांसारिक इच्छा पूर्ति और अपने अहं की तुष्टि के लिए किया जाता है वह राजस यज्ञ है।

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्‌।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ।13।

जहाँ स्वभाव ही मूढ़ता है, जहाँ किसी शास्त्र विधि नियम का पालन नहीं होता, किसी मर्यादा का पालन नहीं किया जाता, जहाँ मन्त्रों के बिना, बिना किसी अन्नदान के अर्थात जहाँ से न पशु, पक्षी, न मनुष्य, न गुरूजन, न ब्राह्मण संतुष्ट होते हैं अर्थात जहाँ से कोई जीव संतुष्ट नहीं होता, जहाँ श्रद्धा का पूर्णतया अभाव होता है, मूढ़ स्वभाव वाला, मूढ़ता से किया जाने वाला ऐसा यज्ञ तामस यज्ञ कहा जाता है।

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्‌।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ।14।

अब श्री भगवान भिन्न भिन्न प्रकार के तप के बारे में बताते हैं। गुरू सेवा अर्थात अपने गुरू की निष्ठा पूर्वक भक्ति, उनके बताये साधन मार्ग में चलना, उनकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करना, उनके दैनिक कार्यों की व्यवस्था देखना आदि, माता पिता की सेवा करना, उनकी आज्ञा का पालन करना, देव पूजन अर्थात देव स्थान, तीर्थ, संतों की स्थली में जाना अर्थात आत्मरत होने के लिए साधन करना, आत्म ज्ञानी महात्मा के दर्शनों के लिए बार बार जाना, शरीर कर्म और मन की पवित्रता, सब प्राणियों के प्रति सरलता, स्त्री के विषय में पूर्ण संयम रखना और मन वाणी कर्म से किसी को दुःख न देना शरीर सम्बन्धी तप है क्योंकि यह सब शरीर से होते हैं।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्‌।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्‍मयं तप उच्यते ।15।

ऐसी वाणी न बोलना जिससे दूसरा उत्तेजित हो अथवा दुःखी हो, दूसरे कल्याण के लिए प्रिय वाणी बोलना, सत्य अर्थात अज्ञान को नष्ट करने वाली वाणी बोलना, निरन्तर शास्त्र अध्ययन एवं प्रभु स्मरण में लगे रहना वाणी सम्बन्धी तप कहलाता है।

मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ।16।

मन की प्रसन्नता अर्थात मन का संकल्प, विकल्प से मुक्त होना, जिसका मन ठहर गया हो, इन्द्रियों की ओर नही भागता है, शान्त अर्थात जो आत्मरत होकर आत्म स्थित हो गया है, मौन अर्थात वासना रहित मौन धारण करते हुए मात्र भगवद् चिन्तन करना, इन्द्रियों का मन से निग्रह, यदि कोई विचार उत्पन्न हो तो वह भगवद् विचार हो, ज्ञान हो, सम्पूर्ण जीवों के कल्याण का भाव हो, यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है।

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ।17।

यह जो तीन प्रकार का शरीर, वाणी और मन सम्बन्धी तप बताया गया है वह फल को न चाहने वाले परमात्मा के साथ निरन्तर जुड़े योगी द्वारा परम श्रद्धा से किया जाता है वह तप सात्विक कहलाता है।

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्‌।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्‌ ।18।

जो तप अपने किसी लालच से अपने सत्कार की इच्छा लेकर अपने अभिमान की संतुष्टि के लिए और लोग मेरी जय जयकार करें अथवा किसी सांसारिक अथवा परमार्थ के स्वार्थ की पूर्ति के लिए किया जाता है जहाँ केवल पाखण्ड दिखायी देता है, जिसका फल मिल भी सकता है और नहीं भी मिलता है और यदि फल मिलता है, तो वह थोड़े समय की संतुष्टि देने वाला होता है ऐसा तप राजस तप कहलाता है।

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्‌ ।19।

जो मूढ़ता के कारण अथवा अज्ञान से, बुद्धि भ्रम से, हठपूर्वक मन वाणी शरीर को पीड़ा देते हुए किया जाता है अथवा दूसरों के अनिष्ट के लिए किया जाता है अर्थात जबरन एक टांग पर पानी में खड़े रहकर, कांटों में लेटकर, अग्नि प्रज्वलित कर उसके भीतर घेरे में बैठकर, बाल-दाड़ी नोचकर, मुर्दे पर बैठ कर, शरीर को कष्ट पहुंचाते हुए अथवा जबरन मौन धारण कर, मन से दूसरे का बुरा चाहने वाले, अपने हित व दूसरे के अहित के लिए निरीह पशुओं को काटने वाले लोगों का आचरण तामस तप कहलाता है।

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌ ।20।

हे अर्जुन, श्रद्धा के अनुसार दान भी तीन प्रकार का होता है। दान देना कर्तव्य है, सत्कर्म है, सब में हरिबोधमयी दृष्टि रख कर, प्राणी मात्र के उपकार के लिए सन्मार्ग से कमाया धन, अन्न अथवा सेवा जो उसके योग्य हो अर्थात जिसे उसकी जरूरत हो जैसे शिवालय में चढ़ाने के लिए ले जाने वाला गंगाजल प्यासे गधे के लिए ज्यादा आवश्यक है, बिना किसी प्रति उपकार के, केवल दयावश यथा समय जब जरूरत हो यथा स्थान जहाँ आवश्यकता हो दिया जाता है, वह दान सात्विक दान कहलाता है।

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्‌ ।21।

जिस दान को देने में अन्दर से कष्ट हो या इस भावना को ध्यान में रखकर दिया जाय कि इस दान को देने से मेरा यह लाभ होगा, जहाँ फल की इच्छा प्रमुख है, दिखावे के लिए पाखंड, दम्भाचरण, लोक परलोक के हित से दिया जाता है, जरूरतमन्द का ध्यान नहीं रखा जाता कि कब कहाँ देना है, केवल अपना प्रयोजन प्रमुख है ऐसा दान राजस दान कहलाता है।

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्‌ ।22।

जहाँ मूढ़ता हो, बुद्धि भ्रम हो, अज्ञान हो, जहाँ दान में दिया जाने वाला धन, अन्न आदि चोरी का हो या छीना हुआ हो, किसी प्राणी का तिरस्कार कर के, दुत्कारते हुए अथवा जो उस दान का दुरुपयोग करे ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है वह दान तामस दान कहलाता है।

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ।23।

तीन प्रकार की श्रद्धा बताने के पश्चात श्री भगवान कहते हैं हे अर्जुन, श्रद्धा न डिगे और योगक्षेम भली भांति हो इसलिए सदा परमात्मा का स्मरण करना चाहिए। इसे बताते हुए वह कहते हैं, आत्मतत्व रूपी परब्रह्म परमात्मा का नाम ’ऊँ‘ ’तत्‘ ’सत्‘ है। ऊँ परमात्मा का मूल नाम है। स्वर विज्ञानी जानते हैं कि शरीर में इसकी स्थिति भृकुटि के मध्य आज्ञा चक्र में है। परमात्मा सृष्टि से परे है अतः उसका दूसरा नाम तत् है। सत् अर्थात जिससे अज्ञान नष्ट होता है यह परमात्मा का तीसरा नाम है। अव्यक्त रूप में परमात्मा का कोई नाम नहीं है परन्तु उसको जानने, बताने के लिए उसे शब्द (नाम) से बांधा गया है। ऊँ तो परमात्मा का शुद्ध अहंकार है इसलिए वही उसका यथार्थ नाम है। परमात्मा के इन तीन नाम ऊँ तत् सत् को आधार मान धर्म के तत्व को जानने वाले ब्राह्मणों ने उपनिषद, वेद और परमात्मा के निमित्त कर्म का विधान किया है।

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌ ।24।

इसलिए ईश्वर के लिए उच्चारण करने वाले जो शास्त्र विधि सम्मत ईश्वर के निमित्त कर्म दान और तप आदि करते हैं वह सदा ऊँ प्रणव का उच्चारण करके अपनी क्रिया आरम्भ करते हैं।

तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ।25।

आत्म स्वरूप परब्रह्म परमात्मा इस जगत से परे है और सबका साक्षी है जो यह जानते हैं वह ‘तत्‘ शब्द का उच्चारण करते हैं। वह तत् स्वरूप परब्रह्म, को उसके निमित्त समस्त कर्म, तप, यज्ञ, दान आदि अर्पण कर निष्काम हो जाते हैं।

सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ।26।

सत अर्थात जिससे अज्ञान नष्ट होता है, यथार्थ के दर्शन होते हैं, जिसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता जो निश्चित है यह जानकर कल्याण के लिए, सरल आचरण करते हुए सत् का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार उत्तम कर्म अर्थात जो कर्म परमात्मा के लिए हैं, जिन कर्मों से परमात्मा में एकता का भाव प्राप्त होता है, के लिए सत् रूपी परमात्मा के सम्बोधन का प्रयोग किया जाता है।

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते ।27।

हे अर्जुन, परमात्मा के निमित्त कर्म, दान एवं तप में जो स्थिति है वह भी सत् कही जाती है। इसलिए सत् नाम को परमात्मा का नाम जान और सत् नाम की विलक्षण शक्ति को स्वीकार कर और पहचान कर, परमात्मा के निमित्त कर्म के साथ सदा सत् शब्द का प्रयोग करना चाहिए।

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ।28।

हे अर्जुन, जिस कर्म में श्रद्धा नहीं है ऐसा हवन, दान, तप, अन्य कर्म सदा असत् हैं अर्थात अज्ञान हैं, मूढ़ता हैं और मूढ़ता से न संसार में कुछ प्राप्त है न मृत्यु के बाद मूढ़ता सद्गति देती है। पुनः जीव अधम योनियों को प्राप्त होता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय : 17
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