इस सृष्टि का जो मूल है वह परब्रह्म परमात्मा मूल से भी ऊपर है अर्थात जहाँ से सृष्टि जन्मी है परमात्मा उससे परे है और माया जिसे अज्ञान कहा है इस सृष्टि का मूल है।
मैं समस्त प्राणियों के हृदय में इस विचार का कारण हूँ कि ‘मैं अमुक हूँ’। मेरे कारण ही ज्ञान होता है क्योंकि मैं ही परम ज्ञान हूँ। मेरे द्वारा ही मूढ़ता, संशय नष्ट होते हैं। ज्ञान मेरा ही स्वरूप है।
आत्मगीता - भाष्यकार- प्रो. बसन्त प्रभात जोशी
अथ पञ्चदशोऽध्यायः उर्ध्वमूल अश्वत्थयोग
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ।1।
श्री भगवान अर्जुन को सृष्टि का रहस्य बताते हुए कहते हैं; इस सृष्टि का जो मूल है वह परब्रह्म परमात्मा मूल से भी ऊपर है अर्थात जहाँ से सृष्टि जन्मी है परमात्मा उससे परे है और माया जिसे अज्ञान कहा है इस सृष्टि का मूल है। उस मूल से परे अक्षर ब्रह्म से यह अश्वत्थ वृक्ष पैदा होता है। माया इस वृक्ष का मूल है, इस वृक्ष का फैलाव ऊपर से नीचे की ओर है। अक्षर ब्रह्म में स्थित माया के बीज से माया का अंकुर फूटता है। माया (अज्ञान) उस अक्षर ब्रह्म से उत्पन्न ब्रह अंश जीव (ज्ञान) को आच्छादित कर सुला देती है। परम शुद्ध जीव (ज्ञान) को अज्ञान (माया) क्रमशः अधिक-अधिक आवृत्त करते जाता है। यही अश्वत्थ वृक्ष की ऊपर से नीचे की ओर फैलने की गति है। यह माया का वृक्ष अश्वत्थ है। अश्वत्थ का अर्थ होता है जो आज है कल नहीं है। वेद (छन्द) इसके पत्ते हैं अर्थात वेद भी माया के पार नहीं जा पाते हैं, अज्ञान से प्रभावित होने के कारण उनकी पहुंच सीमित है। जो मनुष्य इस अश्वत्थ वृक्ष को तत्व से जानता है वही यथार्थ ज्ञानी है।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ।2।
इस अश्वत्थ वृक्ष को माया सत्त्व रज तम तीन गुणों से सींचती है। विषय भोग इसके कोपल हैं, चौरासी लाख योनियाँ इसकी शाखाएं हैं, जो ऊपर नीचे सभी जगह फैली हुयी हैं। कर्म बन्धन इस माया रूपी वृक्ष की जड़ हैं, यह जड़ें सभी ओर फैली हुयी हैं। इस अश्वत्थ वृक्ष को हम मानव देह में भी देख सकते हैं। ब्रह्मरंध्र में अव्यक्त परमात्मा का निवास है। इस अश्वत्थ वृक्ष का आज्ञा चक्र से लेकर मूलाधार तक तना है। आज्ञा चक्र से क्रमशः विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार में ज्ञान क्रमशः कम होता जाता है। अनाहत और उसके नीचे के चक्रों में तीन गुणों का प्रभाव अधिक और अधिक हो जाता है। यहीं से माया मोह राग द्वेष का जन्म होता है। कर्म में प्रवृत्ति, कर्मफल आसक्ति का फैलाव शरीर में होता जाता है। इसे इस रूप में भी देख सकते हैं ज्ञान, माया (अज्ञान), बुद्धि, मन, शब्द, स्पर्श, प्रभा, रस, गन्ध, ज्ञानेन्द्रियाँ, वासना, कर्मेन्द्रियाँ, विषय, संसार, कर्मफल।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ।3।
इस अश्वत्थ वृक्ष का स्वरूप संसार में नहीं दिखायी देता क्योंकि इसका न आदि है न अन्त अर्थात कहाँ से प्रारम्भ हुआ, कहाँ इसका अन्त होगा कोई नहीं बता सकता। यही नहीं यह वृक्ष अच्छी प्रकार स्थित भी नहीं है, क्योंकि यह नाशवान है। इस वृक्ष की जड़ें बहुत ही गहराई तक गयी हैं। अज्ञान इस वृक्ष की जड़ है, जो इतनी प्रभावशाली है कि उसने अव्यक्त परब्रह्म को भी आच्छादित कर रक्खा है। इसको काटने का एक ही उपाय है कि वैराग्य रूपी शस्त्र मन में लेकर इस अज्ञान के विशाल अश्वत्थ वृक्ष पर ज्ञान की धार का प्रहार किया जाय। सतत् अभ्यास, वैराग्य द्वारा प्राप्त ब्रह्म ज्ञान के होने पर ही, यह वृक्ष नष्ट होता है।
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ।4।
वैराग्य से इस संसार रूपी वृक्ष को काटकर उस परम पद को भली प्रकार खोजना चाहिए। यह वह स्थिति है जिसे प्राप्त होकर इस वृक्ष के फल उस मनुष्य को ललचा नहीं सकते हैं। संसार चक्र से वे मुक्त हो जाते हैं। उस परब्रह्म परमात्मा से ही यह संसार की प्रवृत्ति का विस्तार हुआ है क्योंकि वह ब्रह्म इसकी उत्पत्ति मूल से ऊपर है, ‘उर्ध्व मूल’ है। ऐसे आदि परम परमात्मा में निरन्तर आत्मरत रहना चाहिए। उस आत्मतत्व में निमग्न पुरुष पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध होकर उसी में स्थित हो जाता है।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञै
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ।5।
जिसका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिस प्रकार प्रकाश होते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है। जिसने आसक्ति रूपी दोष को जीत लिया है अर्थात कमलवत संसार में रहता है, ऐसा विकारहीन पुरुष जो सदा आत्म स्वरूप में स्थित रहता है; ऐसे आत्मरत ब्रह्म ज्ञानी, जिसकी सभी कामनायें नष्ट हो गयी हैं, भुने बीज के समान जिसमें कामना का अंकुर नहीं फूट सकता, सुख-दुःख द्वन्द्वों से मुक्त होकर परम स्थिति ‘अव्यक्त’ का अधिकारी होता है।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।6।
मेरे परम स्थान (आत्म स्वरूप) को सूर्य चन्द्रमा और अग्नि प्रकाशित नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वह स्थान शाश्वत और परम ज्ञान की स्थिति है। सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि अथवा सृष्टि का प्रत्येक परमाणु उसी की सत्ता से संचालित होता है। उसी के कारण सृष्टि प्रकाशित और संचालित है। उस परम स्थान को प्राप्त कर मनुष्य पुनः अज्ञान को प्राप्त नहीं होता जहाँ अज्ञान का कोई अंश भी नहीं है, पूर्ण बोध स्वरूप जो स्थिति है, वह मेरा परम धाम है।यहाँ परमधाम शब्द परम स्थिति का द्योतक है।
श्रीभगवानुवाच
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ।7।
इस देह में अविनाशी जीव मेरा ही अंश है। जब आत्मा इस देह को अपना मान आचरण करने लगता है तो परमतत्व आत्मा जीवत्व धारण कर लेता है। देह के प्रति अहंकार से आत्मा जीवात्मा हो जाती है। आत्मा प्रकृति से एकता पाकर उसके स्वभाव को स्वीकार कर लेती है, फिर मन और पांच इन्द्रियां मेरी हैं यह मानकर कर्म में प्रवृत्त होती हैं, मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ का भाव उदय हो जाता है। फिर वह आत्मा अपना स्वरूप भूल कर जीवात्मा हो जाती है, उसका संग प्रकृति मन और पांच इन्द्रियों से हो जाता है तथा वह देह त्याग करते समय उन मन इन्द्रियों और प्रकृति को आकर्षित करता है।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ।8।
देह त्याग करते समय इस देह का स्वामी जीवात्मा जब देह त्याग कर जाता है तो जिस प्रकार वायु गन्ध को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाती है उसी प्रकार मन सहित इन्द्रियों को ले जाता है। देह त्याग के समय पांच इन्द्रियों की तन्मात्रायें गन्ध, रस, प्रभा, स्पर्श, शब्द; गन्ध-रस में समाहित हो जाती है फिर गन्ध-रस-प्रभा में,इस प्रकार सब शब्द में समाहित हो जाते हैं, शब्द स्वभाव में समाहित जाता है और स्वभाव के साथ जीवात्मा इस देह से अलग हो जाता है फिर जिस शरीर को धारण करता है वहाँ उस पूर्व देह के स्वभाव और शब्द, स्पर्श, प्रभा, रस, गन्ध को लेकर शरीर में स्थित हो जाता है।
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ।9।
यह जीवात्मा जहाँ भी जाता है अर्थात जन्म लेता है वहाँ मन और इन्द्रियों का विस्तार कर लेता है। वहाँ वह कान, आंख, त्वचा, रसना घ्राण, और मन के द्वारा विषयों को भोगता है।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ।10।
अज्ञानी पुरुष इस आत्मा को शरीर छोड़कर जाता हुआ, शरीर में जन्म लेता हुआ और भिन्न भिन्न विषयों को भोगता हुआ देखते हैं वे अविकारी आत्मा को जन्म लेने वाला और मरने वाला, भोगने वाला मानते हैं। जीव बुद्धि से आत्मा में जीव भाव आरोपित करते हैं परन्तु जिन्हें आत्म ज्ञान हो गया है वह आत्मा को अक्रिय मानते हैं चाहे शरीर में कर्ता, भोक्ता, आते जाते दिखायी देती है परन्तु वह सदा नित्य कूटस्थ है, अविकारी है.
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ।11।
निरन्तर आत्मचिन्तन में लगे, स्वरूप की खोज में रत योगी इस अव्यक्त अविकारी अकर्ता आत्मा को स्वयं आत्म दर्शन कर तत्व से जानते हैं परन्तु जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है जिसमें देह बुद्धि है, जीव-भाव है, जो मूढ़ हैं, वह यत्न करने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ।12।
सूर्य में जो तेज है, जिस कारण सूर्य लगातार अग्नि और प्रकाश स्वरूप है उसका कारण उसके अन्दर छिपी जीव शक्ति मैं ही हूँ। इसी प्रकार जो तेज चन्द्रमा में अग्नि में या अन्यत्र में है उसके पीछे तू मेरा ही तेज समझ। मेरी जीव शक्ति ही मेरी जड़ प्रकृति को आन्दोलित कर यह सब तेज प्रकट कर रही है।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ।13।
पृथ्वी की जो आधार भूत शक्ति है अर्थात जो धारण करने की शक्ति है वह मेरी परा शक्ति के कारण ही है। चन्द्रमा का जो सोम है जिसके कारण पृथ्वी की वनस्पति पुष्ट होती है उन सबके पीछे भी मैं ही छिपा हुआ हूँ अर्थात मेरी परा प्रकृति के कारण अपरा प्रकृति में उसके गुण प्रकट होने लगते हैं।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ।14।
मैं सभी प्राणियों के शरीर में वैश्वानर अग्नि के रूप में प्रज्वलित रहता हूँ। यहाँ प्राण और अपान वायु धौंकनी की तरह इस अग्नि को सुलगाते हैं। मैं इस अग्नि के द्वारा चारों प्रकार के अन्न (कच्चा, पका हुआ, अधपका, द्रव युक्त) को पचाता हूँ अर्थात प्राणियों के शरीर में वैश्वानर अग्नि मेरे कारण ही प्रज्वलित हैं।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ।15।
मैं समस्त प्राणियों के हृदय में इस विचार का कारण हूँ कि ‘मैं अमुक हूँ’। मुझसे स्मृति ज्ञान और अपोहन होता है। स्मृति, का अर्थ है स्मरणशक्ति। यहाँ यह जानना महत्वपूर्ण है कि जो मनुष्य परमात्मा के जितने नजदीक है उसकी स्मरण शक्ति उतनी अधिक अच्छी होती है। ईश्वर कृपा अथवा उसकी नजदीकी को स्मरण शक्ति (याददाश्त) से जाना जा सकता है। मेरे कारण ही ज्ञान होता है क्योंकि मैं ही परम ज्ञान हूँ। मेरे द्वारा ही मूढ़ता, संशय नष्ट होते हैं। वेदों में जो कुछ जानने योग्य ज्ञान है वह मैं ही हूँ, मैं ही ज्ञान का कर्ता और ज्ञान को जानने वाला हूँ। ज्ञान मेरा ही स्वरूप है।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ।16।
इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं एक क्षर पुरुष जो आता जाता, जन्म लेता मरता दिखाई देता है परन्तु अविनाशी है। उपाधि ग्रस्त होने से इस अविनाशी पुरुष का आना जाना प्रतीत होता है इसलिए यहाँ इस अविनाशी जीव को क्षर पुरुष कहा गया है. दूसरा अक्षर पुरुष है। यह उत्तम पुरुष परमात्मा और क्षर पुरुष जीव के बीच मध्यस्थ पुरुष है. यह ब्रह्म की अज्ञानमय अवस्था है। यहाँ से अश्वत्थ जन्म लेता है। माया इस अक्षर पुरुष में बीज रूप में स्थित रहती है। जीव और माया दोनों यहाँ से उत्पन्न होते हैं।
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।17।
इसमें भी अधिक आश्चर्य की बात यह कि इन क्षर अक्षर दो पुरुषों के अलावा एक तीसरा पुरुष भी है। यह पुरुष अत्यन्त श्रेष्ठ है और जब यह होता है तो दोनों पुरुषों के अस्तित्व को समाप्त कर देता है और सर्वत्र यही उत्तम पुरुष व्याप्त हो जाता है। जब द्रष्टा भाव और दृश्य का लोप हो जाता है तो यह पुरुषोत्तम ही रहता है। यह पुरुषोत्तम तीनों लोकों में अर्थात सृष्टि के कण कण में व्याप्त होकर सृष्टि को धारण किये है। यह उत्तम पुरुष ही परमात्मा है, यही विशुद्ध आत्मा है।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ।18।
मैं (पुरुषोत्तम) आत्मा क्षर (नाशवान जड़ पदार्थ) जो माया का संसार है, से परे हूँ तथा दूसरे पुरुष जिसे अक्षर अर्थात अविनाशी जीवात्मा जाना जाता है, से भी श्रेष्ठ हूँ इसलिए संसार में और आत्मतत्व को जानने वाले ज्ञान में पुरुषोत्तम के नाम से जाना जाता हूँ।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ।19।
जो ज्ञानी पुरुष क्षर अक्षर को समझते हुए उनसे परे मुझ आत्मतत्व (पुरुषोत्तम) को भली प्रकार जानते है वह यथार्थ को जानने वाला है, सर्वज्ञ है। वह मुझ आत्मा को ही परम गति, परम स्थिति, परब्रह्म परमात्मा जान लेता है, उसकी समस्त साधना, ध्यान योग, सन्यास, यत्न, भक्ति, उपासना आदि सब मेरे लिए होती है। वह आत्म स्थित सदा मुझ परमेश्वर (आत्मतत्व) को ही भजता है अर्थात सदा आत्मरत रहता है।
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ।20।
हे निष्पाप अर्जुन, मैंने अत्यन्त गोपनीय शास्त्र को तुझे बताया है, यह कोई कल्पना नहीं है, यह यथार्थ है और इसे जानना, समझना और अनुभूत करना हर एक के वश की बात भी नहीं है इसलिए यह गोपनीय है। परन्तु जो मनुष्य इस ज्ञान के तत्व को अर्थात आत्मतत्व को समझ जाता है उसका कल्याण हो जाता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे उर्ध्वमूल अश्वत्थयोग
नाम पञ्चदशोऽध्यायः 15
.....................................
No comments:
Post a Comment