Sunday, September 18, 2011

गीता - आत्मगीता - अध्याय ९ -राजविद्याराजगुह्ययोग (हिन्दी भाष्य ) / भाष्यकार प्रो बसन्त प्रभात जोशी



जो मुझ आत्मा स्वरूप परमेश्वर को पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है उस प्रयत्नशील योग युक्त आत्मा के भक्ति पूर्वक अर्पण, जो उसने मन बुद्धि के द्वारा आत्म देव को किया, उसे मैं आत्म रूप परब्रह्म परमात्मा स्वीकार करता हूँ।        


                                         आत्मगीता  -भाष्यकार प्रो. बसन्त
                           
                                    अथ नवमोऽध्यायःराजविद्याराजगुह्ययोग



श्रीभगवानुवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌ ।1।

श्री भगवान बोले हे अर्जुन, तेरा शिष्य भाव अति प्रशंसनीय है, तेरी मुझमें दोष दृष्टि रहित भक्ति है, इसलिए मैं अत्यन्त गोपनीय ज्ञान योग को विज्ञान सहित अर्थात उसके प्रत्येक तत्व को तुझे बताता हूँ जिसे जानकर तू आत्म ज्ञान को प्राप्त होकर माया के बन्धन से मुक्त हो जायेगा, तू स्वयं अपना नियन्ता हो जायेगा तत्पश्चात तुझे कोई दुःख, कभी और किसी स्थिति में व्याप्त नहीं होगा।

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्‌ ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्‌ ।2।

यह ज्ञान योग जिसे मैं तुझे सम्पूर्ण तत्वों के साथ बताने जा रहा हूँ यह अत्यन्त गोपनीय है, अत्यन्त पवित्र है अर्थात यह अपनी पवित्रता से अज्ञान को भी ज्ञान में बदल देता है। यह अति उत्तम है क्योंकि इसी के माध्यम से सर्वोंत्तम स्थिति प्राप्त होती है। यह प्रत्यक्ष फल देने वाला है अर्थात इसके परिणाम को तू स्वयं अनुभूत करेगा। धर्म युक्त अर्थात आत्म स्वभाव का होने के कारण साधन करने में बड़ा सुगम है और यह ज्ञान परमात्मा का स्वरूप होने के कारण अविनाशी है।

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ।3।

हे अर्जुन, तू यह जान ले जिन्हें आत्मतत्व में, आत्म ज्ञान में श्रद्धा नहीं है वह पुरुष अपने स्वभाव के विपरीत चलते हुए मुझको न प्राप्त होकर विषय वासना एंव कर्मफलों के कारण इस मृत्यु संसार में जन्म लेते हैं, मरते हैं, पुनः जन्म लेते हैं।

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं  तेषवस्थितः ।4।

श्री भगवान कहते हैं हे अर्जुन यह सम्पूर्ण सृष्टि निराकार निर्गुण परमात्मा का साकार विस्तार है। यह जगत निर्गुण परमात्मा से विकसित हुआ है। इस सृष्टि को सर्वत्र अव्यक्त परमात्मा ने परिपूर्ण किया है, वह सृष्टि में बर्फ में जल के समान व्याप्त है। सभी भूत (प्राणी और पदार्थ) परमात्मा के संकल्प के आधार पर ही उनमें स्थित हैं परन्तु परमात्मा उनमें स्थित नहीं है।

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्‌ ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ।5।

यहाँ भगवान श्री कृष्ण चन्द्र कह रहे हैं सब भूत (पदार्थ) मुझ परमात्मा में स्थित नहीं हैं और इससे पहले कह चुके हैं कि सब भूत मुझमें स्थित हैं। परस्पर विरोधी कथन है फिर भी दोनों बातें सत्य हैं। सब भूत मुझमें स्थित हैं अर्थात परमात्मा का ही विस्तार सब भूत हैं। सम्पूर्ण सृष्टि परमात्मा से उत्पन्न होकर परमात्मा में ही लीन हो जाती है। जैसे चन्द्रमा और चाँदनी, सूर्य और उसकी प्रभा एक ही हैं इसी प्रकार परमात्मा और भूत (जगत) एक ही हैं। सभी सृष्टियां परमात्मा में ही कल्पित है। सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं अर्थात आत्मा, पंच महाभूतों से परे है। परमात्मा कर्ता होते हुए भी अक्रिय हैं, अक्रिय होने के कारण वह सभी भूतों और प्रकृति से अलग है। जब सब कुछ एक ही है ‘एकोहम् द्वितीयो नास्ति’ तो फिर कौन किसमें स्थित है, कौन किसमें नहीं है। शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार द्वारा परमात्मा को नहीं जाना जा सकता कोई भी भूत आत्मा के अविकारी और अमर स्वरूप को नहीं रखता है। जीव तत्व और परमात्म तत्व एक होते भी अलग अलग हैं। इस विषय को और अधिक गहराई से बताते हुए कहते हैं; मेरी ईश्वरीय योग शक्ति के प्रभाव को देख, भूतों का धारण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला जीवात्मा (परा प्रकृति) भी भूतों में स्थित नहीं है। जीवात्मा भी शरीर में कर्ता भोक्ता होते हुए भी भूतों में स्थित नहीं है। जीव तत्व पंच भूतों से परे है। इसे इस प्रकार भी जान सकते हैं कि अज्ञान है तो जगत है, अज्ञान नष्ट हो गया तो द्वैत नष्ट हो जाता है केवल ब्रह्म ही रहता है।

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्‌ ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ।6।

जिस प्रकार सर्वत्र विचरने वाला वायु आकाश में ही रहता है, उसी प्रकार सभी भूत मुझमें स्थित हैं। वायु जब डोलता है तब आकाश में अलग आभास होता है, इसी प्रकार जगत ब्रह्म में स्थित है, व्यवहार में ही जगत दिखायी देता है।

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्‌ ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्‌ ।7।

हे अर्जुन, कल्पान्त (महाप्रलय) में सब भूत मेरी अव्यक्त प्रकृति में लीन होते हैं कल्प के आदि (प्रारम्भ) में उस अव्यक्त प्रकृति से पुन: उनकी रचना होती है।

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्‌ ।8।

परमात्मा जब व्यक्त प्रकृति को अपनी अव्यक्त (परा) प्रकृति द्वारा स्वीकार करते हैं तब सृष्टि भिन्न भिन्न आकार ग्रहण करने लगती हैं। प्राणी मात्र का विस्तार होने लगता है और भूत समुदाय बार बार मेरे द्वारा अक्रिय तथा कोई सम्बन्ध न रखने पर भी रचा जाता है।

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ।9।

इसी प्रकार कर्मों की उत्पत्ति का कारण भी मैं (परमात्मा) हूँ क्योंकि मेरे (परमात्मा के) विक्षोभ के कारण ही कर्म उदय होते हैं। परन्तु उन कर्मों से न मेरा कोई सम्बन्ध है, उन कर्मों से सम्बन्ध न होने के कारण वे कर्म मुझे नहीं बांधते हैं क्योंकि उनमें मेरी कोई आसक्ति नहीं है। उनके प्रति मैं सदा उदासीन हूँ। उत्पत्ति, लय, स्थिति  सभी कर्म मेरी परा प्रकृति व अपरा प्रकृति के संयोग का खेल है। मैं तटस्थ रहता हू, इसे इस प्रकार भी जाना जा सकता है कि परमात्मा की ज्ञान शक्ति व किय्रा शक्ति ही समस्त जगत का कारण है। परमात्मा सदा अक्रिय व तटस्थ है।

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ।10।

हे अर्जुन, मेरी अध्यक्षता में प्रकृति सभी चर अचर की रचना करती है। सभी प्राणी सृष्टि के पदार्थों का कारण, परमात्मा की परा और अपरा प्रकृति का परिणाम हैं। यही और भी गहराई से जाने तो ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति ही सबके लिए उत्तरदायी है। इस कारण ही समस्त जगत का आवागमन चक्र निरन्तर चल रहा है।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्‌।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्‌ ।11।

अज्ञानी मनुष्य मेरे परम भाव कि मैं ही अव्यक्त अक्षर परमात्मा, आत्म रूप में सब में स्थित हूँ, विश्वात्मा हूँ, मन बुद्धि से परे हूँ, सबका आदि कारण हूँ, को नहीं जानते हैं। मुझे साधारण देह धारी मनुष्य समझते हैं जबकि मेरा मानवीय शरीर मेरे ऐश्वर्य की लीला मात्र है। यह शरीर मैंने धारण किया है। परन्तु अज्ञानी मुझे, सब भूतों के ईश्वर को सामान्य मनुष्य समझ कर मेरे वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते । भगवान श्री कृष्ण चन्द्र को उस युग में अनेक अज्ञानी राजा-प्रजा साधारण मनुष्य समझते रहे। आज भी ब्रह्मज्ञानी विश्वात्मा संत को साधारण मनुष्य की तरह ही अज्ञानी पुरुष द्वारा देखा जाता है। इसमें उस मनुष्य का भी दोष नहीं, क्योंकि जब तक जीव भाव रहता है तब तक परमात्म दर्शन नहीं हो सकता। ब्रह्मज्ञानी ही ब्रह्म के स्वरूप को जान पाता है अथवा जिस जीव पर ब्रह्मज्ञानी की कृपा हो जाय जैसे अर्जुन पर महायोगी भगवान श्री कृष्ण चन्द्र की कृपा हुयी।

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ।12।

हे अर्जुन आसुरी वृत्ति के पुरुष व्यर्थ आशा लिये होते हैं। उनके कर्म व्यर्थ हैं, उनका ज्ञान व्यर्थ है, उनका चित्त सदा भ्रमित रहता है। वह कभी भी ईश्वरीय स्वरूप अथवा आत्मतत्व के बारे में नहीं जान पाते।

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्यम्‌ ।13।

दैवी प्रकृति के आश्रित जो महात्माजन हैं वही मेरे सगुण ईश्वरीय स्वरूप और आत्मतत्व के बारे में जान पाते हैं तथा मुझे सब भूतों का आदि कारण, नाश रहित अक्षर जानकर निरन्तर मन से मुझे भजते हैं अर्थात अपना मन सदा मुझ विश्वात्मा में लगाये रखते हैं। आत्मरत होते हैं और अवतारी स्वरूप में श्रद्धा रखते हैं, मुझे मेरी कृपा से पहचानते हैं।

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ।14।

द्रढ़व्रती जो हैं अर्थात जो सतत साधन यत्न और अभ्यास करते हैं, वैराग्य जिनका स्वभाव है, वह निरन्तर अनन्यता से मुझे स्मरण करते हैं अर्थात ऊँ को व्यवहार में लाते हैं, यही कीर्तन है। मुझ आत्म रूप शरीर धारी को बार-बार प्रणाम करते हुए अथवा स्वयं अपने आत्म स्वरूप को प्रणाम करते हुए अनन्यता से मेरी उपासना करते हैं अर्थात स्मरण चिन्तन करते हुए सदा मेरे समीप रहते हैं।

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।15।

अन्य ज्ञान योगी मुझे ज्ञान यज्ञ से अभिन्न भाव रखते हुए पूजन करते हैं। स्वयं अपने को ब्रह्म में स्थित किये रहते हैं। आत्मरत, आत्मवान योगी सदा ही शिव है, सदा ही ब्रह्म है, इसी भाव से मेरी उपासना करते हैं। कई ज्ञानी योगी मुझे विश्वात्मा रूप में पूजते हैं, सभी चराचर भूतों में मुझे स्थित देखते हैं, ब्रह्म और जगत को अभिन्न रूप से स्वीकारते हैं।

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्‌ ।
मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्‌ ।16।

परमात्मा के निमित्त जो कार्य (यज्ञ) हैं उनका संकल्प मैं हूँ। मैं ही यज्ञ हूँ, परमात्मा को अर्पित अन्न, औषधि, मन्त्र, घृत, अग्नि, आहुति (क्रिया) मैं ही हूँ अर्थात परमात्मा का संकल्प ही कर्म है अतः परमात्मा हर कर्म में प्रतिष्ठित है। जो यह भाव रखता है उसके सभी कर्म यज्ञ स्वरूप अर्थात परमात्मा के निमित्त हो जाते हैं। श्री भगवान ने कण कण में परमात्मा हैं इसी का ज्ञान यहाँ दिया है।

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ।17।

मैं इस जगत का पिता हूँ अर्थात जीव प्रकृति मैं ही हूँ। जीव प्रकृति द्वारा जड़ प्रकृति जगत को जन्म देती है अतः मैं जगत की माता हूँ। अव्यक्त परमात्मा जिसकी परा और अपरा, प्रकृति है वह मैं ही हूँ अर्थात इस जगत का पितामह मैं ही हूँ। मैं ऊँकार हूँ अर्थात ऊँ ही परमात्मा का नाम है। मैं ही “शब्द”  ब्रह्म हूँ। मैं ही ऋजु, साम, और यजुवेद हूँ अर्थात जानने योग्य ज्ञान और जिसके द्वारा मुझे जाना जाय वह ज्ञान भी मैं ही हूँ।

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌ ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌ ।18।

सब प्राणियों की गति जहाँ सभी प्राणी मृत्यु के बाद जाते हैं तथा जहाँ व्यक्त और अव्यक्त प्रकृति भी सभी प्राणियों सहित समा जाती है तथा पुनः उत्पन्न होती है वह गति भी मैं हूँ। सभी भूतों का भरण पोषण करने वाला, सबका स्वामी, साक्षी अर्थात सभी कर्मों को देखने वाला, सबका वास स्थान, प्रत्युपकार न चाहते हुए सभी का हित करने वाला, सबकी उत्त्पत्ति और मृत्यु का हेतु, आधार, स्थिति, सबका निधान और नाश करने वाला कारण भी मैं ही हूँ।

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्‌णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ।19।

हे अर्जुन, पृथ्वी वासियों के लिए मैं अप्रत्यक्ष रूप से सूर्य के रूप में तपता हूँ, वर्षा का कारण हूँ, मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ, सत् असत् मैं ही हूँ अर्थात परमात्मा सर्वत्र चर अचर में व्याप्त हैं। माया के कारण अलग अलग प्रकृति दिखायी देती है, सत् असत् दिखायी देता है। वास्तव में सभी ब्रह्म का ही विस्तार है, ज्ञान होते ही परम अव्यक्त ही स्थित दिखायी देता है।

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्‍वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्‌ ।20।

तीन वेदों में वर्णित सकाम कर्म काण्डों के द्वारा मेरी अथवा देवताओं की उपासना करने वाले भी ज्ञान को प्राप्त करने वाले हैं अर्थात सोम पान करते हैं (सोम पान चन्द्रमा की ज्योति का पान अथवा अमृत पान अर्थात ज्ञान का पान जो सकाम होने के कारण निश्चित अवधि तक और निश्चित फल देता है)। यह पाप रहित पुरुष अपने पुण्यों के फलस्वरूप स्वर्ग और दिव्य लोकों को प्राप्त होते हैं।

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ।21।

कामना लिए ईष्वर और देव यजन करने वाले, फलस्वरूप स्वर्ग लोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों स्वभावों सत्त्व, रज, तम में आश्रित जो सकामी पुरुष जो भोग की कामना रखते हैं और इसके लिए ईश अथवा देव पूजन करते हैं, वह बार बार संसार चक्र, जन्म मृत्यु में घूमते हैं ।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌ ।22।

जो अनन्य रूप से मुझ आत्मा में रत हैं, आत्मरत हुए सभी कामनाओं का त्याग करते हैं, निरन्तर आत्म स्थित होकर मेरा चिन्तन करते हैं उनके योग और साधन में यदि कहीं कोई कमी होती है उसे मैं परमेश्वर, जो स्वयं उनके आत्म रूप से स्थित है, पूरा कर देता हूँ।

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्‌ ।23।

हे अर्जुन जो अन्य जन दूसरे देवताओं का पूजन करते हैं वे भी मुझको ही पूजते हैं। (क्योंकि मैं ही सर्व व्यापक हूँ तथा सभी देवी देवता मुझ परमेश्वर की विभूति हैं)। उनका यह पूजन अज्ञान पूर्वक है अर्थात वह मुझ आत्मरूप को नहीं पहचानते अतः इधर उधर भटकते हैं।

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ।24।

मैं आत्मा रूप से स्थित परमेश्वर सभी यज्ञों (कर्मों) का जीव रूप में भोगने वाला तथा सबका, परा अपरा सभी प्रकृति का स्वामी हूँ। इस तत्व को जो नहीं जानते वह आत्म रूप मुझे कभी प्राप्त नहीं हो सकते और वह जन्म मृत्यु के चक्कर में भटकते रहते हैं।

यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्‌ ।25।

देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, इसी प्रकार पितरों को पूजने वाले पितरों को तथा भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं। परन्तु जो मुझ आत्मा, विश्वात्मा का पूजन करते हैं, मुझ आत्म स्वरूप में नित्य युक्त हैं वह मुझे प्राप्त होते हैं अर्थात जिसका जैसा भाव होता है उसे वैसा ही फल मिल जाता है।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ।26।

जो मुझ आत्मा स्वरूप परमेश्वर को पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है उस प्रयत्नशील योग युक्त आत्मा के भक्ति पूर्वक अर्पण, जो उसने मन बुद्धि के द्वारा आत्म देव को किया, उसे मैं आत्म रूप परब्रह्म परमात्मा स्वीकार करता हूँ। इसी प्रकार शरीर रूप में प्रकट मुझ परमेश्वर श्री कृष्ण को प्रीति पूर्वक पत्र, पुष्प, फल, जल आदि जो अर्पित करता है उसे मैं प्रीति पूर्वक स्वीकार करता हूँ।

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्‌ ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्‌ ।27।

हे अर्जुन, जो कर्म तू करता है, जो भोजन आदि तू खाता है, जो हवन करता है दान देता है, तप करता है, वह सब मुझ आत्म रूप परमेश्वर को अर्पण कर अर्थात अपने प्रत्येक व्यवहार में मुझ आत्म रूप परमेश्वर से जुड़ जा।

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्य से कर्मबंधनैः ।
सन्न्यासयोगमुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ।28।

जब सभी कर्म भगवत (आत्म) अर्पण हो जायेंगे तो अपने लिए कोई कर्म नहीं बचेगा। तू स्वयं निष्काम हो जायेगा और तेरा ज्ञान योग सरलता से सिद्ध हो जायेगा। इस ज्ञान योग के सिद्ध होने से तू कर्म बन्धन से मुक्त होकर आत्म स्वरूप हुआ मुझ अव्यक्त को प्राप्त होगा।

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌ ।29।

मैं समस्त प्राणियों में सम भाव से व्याप्त हूँ। जीव रूप में कर्ता, भोक्ता होकर स्थित हूँ तथा परमात्मा रूप में साक्षी भाव से स्थित हूँ। मैं सबके लिए एक सा हूँ, न मेरा कोई प्रिय है न अप्रिय परन्तु जो भक्त मुझमें आसक्त हैं, मुझ आत्म रूप में स्थित हैं, मेरे लीला मय शरीर में अनुरक्त हैं, वह मुझे विशेष प्रिय हैं। मैं उनमें आत्म रूप में प्रकट रहता हूँ और वह मुझ विश्वात्मा में सदा प्रकट रहते हैं अर्थात मेरा ही स्वरूप हो जाते हैं।

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्‌ ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ।30।

यहाँ तक कि दुराचारी मनुष्य पष्चाताप के परिणाम स्वरूप मेरी शरण आकर, मुझ परमेश्वर के आत्म स्वरूप में स्थित होकर भजन करने वाला, अथवा देह धारी ब्रह्मज्ञानी में परम श्रद्धा से युक्त होकर नित सेवा करने वाला, उनके बताये मार्ग पर चलने वाला, देर सवेर आत्म स्वभाव को अपनाने लगता है और आत्मा के स्वभाव, परम शान्ति को प्राप्त होता है। उसके चित्त में परम शान्ति के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। हे अर्जुन, तू यह जान ले मेरा जो भक्त है, जो अपने आत्म स्वरूप में अनुरक्त हो गया है, चाहे उसने पहले कितने ही निषिद्ध (पाप) कर्म क्यों न किये हों,उन सबसे वह मुक्त हो जाता है । वह कभी नष्ट नहीं होता, स्वरूप स्थिति उसे स्वाभाविक रूप से प्राप्त होती है। महर्षि बाल्मीकि का जीवन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ।31।

मेरे लीला मय स्वरूप में अनुरक्त प्रेमी भक्त षीघ्र ही आत्म स्वभाव (धर्म) में स्थित हो जाते हैं, इस प्रकार परम विशुद्ध ज्ञान को उपलब्ध परम शान्ति को प्राप्त होते हैं। हे अर्जुन, तू इस परम सत्य को निश्चय पूर्वक जान ले कि मुझसे प्रीति रखने वाला आत्मरूप हुआ कभी नष्ट नहीं होता। वह अमृततत्व को स्वाभाविक रूप से पा लेता है।

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्‌ ।32।

मेरे लीला मय स्वरूप में अनुरक्त शरण में आये स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि के अन्य प्राणी और मनुष्य भी आत्मतत्व को प्राप्त होते हैं क्योंकि मेरे प्रभाव से उनका स्वभाव ज्ञान की ओर बढ़ता है और उनका रज, तम कम होने लगता है और वह आत्म स्वरूप को जान कर आत्मवान हो जाते हैं।

यहाँ स्त्री, वैश्य, शूद्र तीनो शब्द महत्वपूर्ण हैं. इन तीनो के लिए बोध का मार्ग कठिन माना गया है. स्त्री में पुरुष की अपेक्षा रज प्राकृतिक रूप से अधिक होता है, उसमें ममता मोह अधिक होता है. वह अपने घर परिवार से आसक्ति अधिक रखती है. इसी प्रकार प्राकृतिक रूप से वह हर माह रजस्वला होती है इस कारण उन्हें पुरुष की अपेक्षा योग सिद्ध करने में दोगुना पुरुषार्थ करना पड़ता है. वेश्य की धन में प्रबल आसक्ति होती है. धन के प्रति अत्याधिक लोभ होता है इसलिए रुपये पैसे का मोह और लोभ छोड़ना बहुत कठिन है. धन में आसक्ति रखने वाले को वेश्य कहा जाता है. इस आसक्ति के कारण वेश्य  का योग सिद्ध करना  दोगुना - तिगुना पुरुषार्थ का काम है. शूद्र उसे कहे है जो बुद्धि से जड़ हो इसलिए कहा जाता है 'जन्मने जायते शूद्र संस्कारेण जायते द्विजः' जन्म से सभी शूद्र होते हैं और संस्कार से उनका दूसरा जन्म होता है अर्थात विद्या से उनकी बुद्धि की जड़ता नष्ट होती है. परन्तु जो बुद्धि  से हीन रहता है उस शूद्र का योग सिद्ध होना निसंदेह कठिन है. यहाँ श्री भगवान् कहते है कि स्त्री, वैश्य, शूद्र जिनमें मोह -माया, अज्ञान अधिक है अथवा वे जीव जो किसी कर्म फल के कारण किसी कुबुद्धि अथवा दुर्बुद्धि से युक्त परिवारों में जन्म ले लेते हैं मेरी शरण में आने पर वह भी मेरे प्रभाव से, मेरी कृपा से उस परम बोध के मार्ग की और बड़ते हैं और बुद्धत्व प्राप्त करते हैं.

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्‌ ।33।

जो पुण्यशील ब्राह्मण हैं, जिसे ज्ञान उसके स्वभाव में मिला है तथा इसी प्रकार राजर्षि जो स्वभाव से कल्याण मार्ग में रत हैं वह सभी भक्त जन मेरे नारायण स्वरूप की शरण में आकर आत्मरत हो जाते हैं। अतः सुख रहित इस नाशवान शरीर में सदा मेरे नारायण स्वरूप का निरन्तर ध्यान, मनन, चिन्तन कर। सदा आत्मरत हो।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण: ।34।

अतः तू अपना मन मुझ आत्मस्वरूप परमेश्वर में लगा । मेरा भक्त बन अर्थात स्वरूप अनुभूति कर। मेरा पूजन कर, मुझे प्रणाम कर अर्थात सभी कर्म मुझ आत्म स्वरूप परमात्मा के लिए कर, इस प्रकार मुझ में सदा आत्मरत हुआ तू मुझ अविनाशी परमात्मा का स्वरूप हो जायेगा।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः 9

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