Tuesday, September 20, 2011

गीता - आत्मगीता - अध्याय १६ -दैवासुरसम्पद्विभागयोग (हिन्दी भाष्य ) / भाष्यकार प्रो बसन्त प्रभात जोशी



विभिन्न आशाओं के जाल में फंसे हुए आसुरी वृत्ति के मनुष्य सदा काम और क्रोध में रहते हैं। नित नई कामना करते हैं। हर कामना पूरी नहीं हो सकती और कामना में विघ्न होने से क्रोध उत्पन्न होता है।
विषय भोग ही इनका जीवन है जिसके लिए अन्याय पूर्वक धन आदि का संग्रह करने का प्रयत्न करते हैं।




                                          आत्मगीता  -  भाष्यकार- प्रो. बसन्त
                                                                       

                                    अथ षोडशोऽध्यायः दैवासुरसम्पद्विभागयोग

श्रीभगवानुवाच

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌ ।1।

यहाँ  श्री भगवान कृष्ण चन्द्र अर्जुन को दैवी सम्पदा प्राप्त पुरुषों के लक्षण बताते हैं। दैवी सम्पदा प्राप्त पुरुषों में भय का अभाव हो जाता है, जीव भाव नष्ट होने से मनुष्य जन्म मृत्यु जरा दुःख के भय से मुक्त हो जाता है। उसकी बुद्धि शुद्ध हो जाती है। संकल्प विकल्प जन्म नहीं लेते। सूक्ष्म हुयी बुद्धि आत्म आनन्द का अनुभव करने लगती है। ज्ञान योग से मेरे में जिसकी स्थिति द्रढ़ हो गयी है अर्थात जो आत्म स्थित हो गया है, परहित के लिए निसंकोच भाव से सर्वस्व दान करने वाले अथवा दूसरों की सेवा में बिना प्रत्युपकार के लगे हुए, जिसकी इन्द्रियां उसके वश में हैं, स्वभाव में स्थित और परमात्मा के निमित्त कर्म करना, निरन्तर शास्त्र वचनों का चिन्तन मनन करना, तप (जप कहाँ से आ रहा है इसे देखना तप है), में लगा हुआ, मन से सरलता अर्थात बालक के समान सरल जो मिट्टी सोने, अच्छे बुरे को समान समझता है।

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्‌।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्‌ ।2।

मन वाणी कर्म से किसी को दुख नहीं देना, सत्य अर्थात जिसके संशय और अज्ञान नष्ट होकर ज्ञान की प्राप्ति हो गयी है। त्याग अर्थात अहं बुद्धि का त्याग, देह भावना का त्याग विशुद्ध ज्ञान की स्थिति (जहाँ शान्ति और आनन्द होता है), किसी की निन्दा न करना, किसी के दोष न देखना, सब प्राणियों में बिना इस विचार के कि वह अच्छा है या बुरा, सभी की बिना स्वार्थ के भलाई करना, किसी भी विषय का संयोग होने पर उसमें आसक्ति नहीं होना, जो संसार के हित के लिए अपने हृदय में कोमलता रखते हैं, अपने गुणों की चर्चा होने पर जो लजा जाते हैं, जिनमें व्यर्थ चेष्टा का अभाव हो गया है अर्थात जिसने मन को वश में करके इन्द्रियों को अपाहिज सा बना दिया है।

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहोनातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ।3।

तेज अर्थात आत्मा की ओर मन की गति से जो भाव उत्पन्न होता है वह तेज है, क्षमा, अपने प्रति अपराध करने वाले को भी अहंकार हुए बिना अभय देना, धृति, दैहिक, दैविक, भौतिक कष्ट आने पर भी धैर्य धारण करना, शान्त रहना, जो बाहर भीतर से शुद्ध हो, जो किसी भी प्राणी से शत्रु भाव न रखे तथा सभी प्राणियों का हित चाहने वाला हो, अपने में पूज्यता के अभिमान का अर्थात पूज्यता से जिनमें संकोच होता है; यह 26 गुण दैवी सम्पदा को लेकर जन्मे पुरुष में होते हैं।

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्‌ ।4।

हे अर्जुन, दम्भ अर्थात वास्तविकता छिपाकर मिथ्या रूप दिखाना, ईश्वर भक्ति का गर्व पूर्वक बाजार में प्रचार करना, दर्प, सबको नीचा दिखाने की आदत, आधा जल भरा हुआ गागर जिस प्रकार छलकता है उसी प्रकार जो प्रभुता को नहीं पचा पाता, अभिमान अर्थात अपने को, अपने ज्ञान को श्रेष्ठ मानना, क्रोध, कठोर वाणी से दूसरे को जलाना, अपमान करना, मूढ़ता जो शुभ और अशुभ में फर्क नहीं कर सकता, आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न पुरुष के लक्षण हैं।

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ।5।

दैवी सम्पदा कर्म बन्धन, अज्ञान बन्धन, माया बन्धन से मुक्ति के लिए है। दैवी सम्पदा परम ज्ञान को उपलब्ध कराती है, आसुरी सम्पदा लोहे की जंजीर है जो जीव को अपनी बेडि़यों में जकड़ लेती है। हे अर्जुन, तू मत घबरा क्योंकि तू दैवी सम्पदा लेकर जन्मा है।


द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु ।6।

श्री भगवान् अर्जुन से कहते हैं - इस संसार में दो अनादि मार्ग हैं, आसुरी प्रकृति और दैवी प्रकृति। दैवी प्रकृति के बारे में मैं तुझे विस्तार से बता चुका हूँ अब तू आसुरी प्रकृति के बारे में सुन।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ।7।

आसुरी स्वभाव वाले नहीं जानते कि किस कर्म को करना चाहिए किस कर्म से दूर रहना चाहिए, किस कार्य से स्वयं उनकी हानि होगी तथा किसी कार्य से उन्हें फायदा होगा इस विषय में वह मूढ़ होते हैं क्योंकि अत्याधिक तम और रज का प्रभाव उनमें होता है। न उनका अन्तःकरण शुद्ध होता है न वह शारीरिक रूप से पवित्र होते हैं, उनका कोई आचरण श्रेष्ठ नहीं होता, वह दूसरे को अपमानित करने वाले, कष्ट देने वाले गलत मार्ग में डालने वाले होते हैं। सत्य से कोई प्रीति अर्थात अज्ञान का नष्ट करने के लिए उनका कोई कार्य नहीं होता, ज्ञान के लिए वह कभी लालायित नहीं रहते।

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्‌।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्‌ ।8।

वे आसुरी वृत्ति वाले जगत को आश्रय रहित, असत्य और बिना ईश्वर के मानते है। यह संसार स्त्री पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है और काम ही इसका कारण है, इसके सिवा और कुछ भी नहीं है। वह यह मानकर चलते हैं जो आज है वही सब कुछ है। भोग ही उनका जीवन है। शास्त्र उनके लिए मिथ्या है। दैवी सम्पदा मूर्खता है। देह ही उनके लिए सर्वोपरि है। उनके अनुसार पाप-पुण्य,  स्वर्ग-नरक, ज्ञान, ईश्वर सब कल्पना है।

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ।9।

इस प्रकार मिथ्या दृष्टि को आधार मानकर चलने वाले जिनका ज्ञान नष्ट हो गया है, जिन की बुद्धि अल्प है, ऐसे आसुरी वृत्ति के लोग सबका अपकार करने वाले कठोर और निन्दनीय कर्म (विकर्म) में लगे रहते हैं। ऐसे मनुष्य से जड़ चेतन सभी त्रास पाते है। जगत के अहित के लिए ही इनका जन्म होता है।

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्‍गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ।10।

ये दम्भ, मान, मद से युक्त मनुष्य किसी भी प्रकार से पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर संसार में विचरते हैं। यही नहीं उनमें अज्ञान के कारण अनेक भ्रान्ति पूर्ण बातें मस्तिष्क में भरी रहती है, जिसके कारण उनका आचरण भ्रष्ट रहता है। जगत के प्राणियों को पीड़ित करने वाले, उन्मत्त मनमाना पापाचरण करते हैं।

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ।11।

उनका केवल एक ही विचार रहता है, कैसे ही भोग करें, कैसे सुख मिले। इसके लिए कुछ भी करना पड़े इस कारण मृत्यु होने तक अनेक चिन्ताओं को पाले रखते हैं कैसे भी जमीन जायदाद बढ़ानी है, ऐशो-आराम की वस्तुएं जुटानी हैं, भोग करना है इस व्यक्ति को नष्ट करना है आदि सदा विषय भोग में लगे, उसे ही सुख मानने वाले होते हैं।

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्‌ ।12।

विभिन्न आशाओं के जाल में फंसे हुए आसुरी वृत्ति के मनुष्य सदा काम और क्रोध में रहते हैं। नित नई कामना करते हैं। हर कामना पूरी नहीं हो सकती और कामना में विघ्न होने से क्रोध उत्पन्न होता है। विषय भोग ही इनका जीवन है जिसके लिए अन्याय पूर्वक धन आदि का संग्रह करने का प्रयत्न करते हैं।

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्‌।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्‌ ।13।

अपने समाज में यह कहते फिरते हैं मैंने यह प्राप्त कर लिया है,अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूंगा जैसे एक कारखाना लगा दिया है दो और लगाने हैं, इस साल इतना कमाना है अगले वर्ष दुगना करना है, मेरे पास इतना धन है फिर इतना हो जायेगा।

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ।14।

इस शत्रु को मैंने मार डाला है या नष्ट कर दिया कल दूसरे को भी मटियामेट कर दूंगा मैं मालिक हूँ, मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही बलवान हूँ, मैं ही सिद्ध हूँ, मैं ही भोगने वाला हूँ, सब मेरे आधीन हैं, मैं ही पृथ्वी का राजा हूँ, यह सब मेरा ही ऐश्वर्य है आदि।

आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ।15।
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ।16।

मैं बड़ा धनी हूँ, कुबेर से ज्यादा धन मेरे पास है, मैं बड़े कुटुम्ब वाला हूँ, मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। जो हूँ मैं ही हूँ, मैं यज्ञ करूंगा, दान दूँगा, आमोद प्रमोद करूंगा, ऐसी कभी खत्म नहीं होने वाली कामनाओं को लिए हुए रहते हैं। इनका हृदय सदा जलता रहता है। इनकी बुद्धि अज्ञान से मोहित व भ्रमित रहती है। यह जमीन, धन, परिवार, झूठी प्रतिष्ठा के मोह से घिरे रहते हैं। सदा विषय भोग में लगे अत्यन्त कामी आसुरी वृत्ति के यह लोग घोर नरक को प्राप्त होते हैं अर्थात मूढ़ योनियों को प्राप्त होते हैं। आत्मा की अधोगति नरक है और उर्ध्वगति स्वर्ग है।

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्‌ ।17।

यह सदा दूसरों से अपने को हर बात में श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी पुरुष धन और झूठेमान मद से युक्त होकर दिखावे का यज्ञ पूजन करते हैं और जिसमें शास्त्र की बतायी विधि का पालन नहीं किया जाता केवल अपनी वाहवाही के लिए पाखण्ड पूजन आदि करते हैं।

अहङ्‍कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ।18।

यह आसुरी वृत्ति के पुरुष अहंकार, बल, घमण्ड, कामना, क्रोध आदि के आश्रित रहते हैं। सदा दूसरों की निन्दा करते हैं, इस प्रकार अपने शरीर में तथा दूसरे के शरीर में स्थित परमात्मा से अहंकार और मूढ़ भाव के कारण द्वेष करते हैं।

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्‌।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ।19।

अपने आत्मतत्व से द्वेष करने वाले मूढ़ पापाचारी क्रूर कर्मी अधम मनुष्यों को मैं इस संसार में बार-बार अशुभ योनि यथा अंग भंग शरीर, असाध्य जन्मजात बीमारी लिए एवं मूढ़ मनुष्यों के रूप में डालता हूँ।

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्‌ ।20।

हे अर्जुन, वे मूढ़ (अज्ञानी) पुरुष मुझ आत्मा स्वरूप परमात्मा को नहीं जानते हैं, इस कारण उनकी ज्ञान की ओर वृत्ति पैदा नहीं होती और जन्म जन्मान्तर आसुरी (मूढ़) योनि को प्राप्त होते हैं। कर्मानुसार घोर क्रूर कर्म होने के कारण नीच से भी नीच मूढ़ योनि को प्राप्त होते हैं।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌ ।21।

काम, क्रोध और लोभ यह तीन नरक के द्वार हैं अर्थात जहाँ काम क्रोध और लोभ होगा वहाँ मूढ़ता की अधिकता होगी और मूढ़ता (तमस) नीच से नीच योनि की ओर ले जाती है। इन तीनों से आत्मा का स्वरूप आच्छादित हो जाता है। जीव अपनी स्वरूप स्थिति को पूर्णतया भूल जाता है और अधोगति की ओर चल देता है। अतः आत्म स्वरूप को विस्मृत करने वाले इन तीनों मूढ़ता के स्वजनों को हमेशा के लिए त्याग देना चाहिए।

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्‌ ।22।

हे अर्जुन, इन तीन काम, क्रोध और लोभ नरक के द्वार से मुक्त पुरुष ही ज्ञान आचरण कर अपना कल्याण कर पाता है क्योंकि इनके रहते ज्ञान का दीप नहीं जलता। इन तीनों के नष्ट होने पर ही सहज वैराग्य और ज्ञान हो जाता है और साधक परमगति अर्थात आत्मतत्व को प्राप्त होता है।

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌ ।23।

जो पुरुष शास्त्र विधि को त्याग कर अपनी इच्छा से अपनी कामना और लोभ संतुष्टि के लिए मनमाना आचरण करता है, वह इन्द्रियों से पराजित कभी भी सिद्धि को प्राप्त नहीं होता। परम गति तो बहुत दूर की बात है फिर सुख, आनन्द, ज्ञान, शान्ति उसे कैसे प्राप्त हो सकती है।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ।24।

अतः क्या कर्तव्य हैं और कौन से अकर्तव्य हैं इसमें शास्त्र को प्रमाण मानना चाहिए। जिन कर्मों का शास्त्र निषेध करते हैं उन्हें नहीं करना चाहिए। जिन्हें शास्त्र अनुमति देते हैं वही कर्म करने योग्य हैं क्योंकि शास्त्र समस्त नियम मुमुक्ष जनों के बनाये हैं। इसे जान कर हे अर्जुन, तू शास्त्र सम्मत कर्म कर।


ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्नीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः 16

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