जीव प्रकृति जब स्वेच्छा से जड़ प्रकृति से मिल जाती है तब प्राणियों का जन्म होता है।
योगमाया ज्ञान का हरण कर लेती है इसलिए मैं योगमाया के कारण छिपा रहता हूँ।
अत्मगीता - भाष्यकार प्रो. बसन्त
अथ सप्तमोऽध्यायः ज्ञानविज्ञानयोग
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ।1।
हे पार्थ जिनका मन सदा मुझमें आसक्त है, जैसे कामी को स्त्री प्यारी होती है और लोभी को धन प्यारा होता है, उसी प्रकार जो मुझमें अर्थात मेरे आत्म स्वरूप में आसक्त हैं तथा मेरे आश्रित होकर सदा मुझसे जुड़े रहते हैं अर्थात जिनका मन बुद्धि सदा आत्मरत है, वह आत्मा के सम्पूर्ण बल ऐश्वर्य विभूतिमय स्वरूप को किस प्रकार जानता है, उसे अच्छी प्रकार सुन।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ।2।
तू आत्मा की विभूति बल ऐश्वर्य को जानने वाले ज्ञान और विज्ञान को सुन जिसे जानकर इस संसार में कुछ भी जानने योग्य ज्ञान श्रेष्ठ नहीं रहता है।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ।3।
आत्मतत्व के लिए हजारों मनुष्यों में कोई एक पूर्व जन्म का योग भ्रष्ट पुरुष मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है। उन यत्न करने वाले सिद्धों में भी कोई बिरला ही मेरे आश्रित होकर तत्व से मेरे आत्म स्वरूप को जानता है। शंकराचार्य कहते हैं, पहले मनुष्य जीवन दुर्लभ है, उसमें भी मुक्त होने की इच्छा (मुमुक्षत्व), उसमें भी सत् पुरुषों का संग। यह सब मिलने पर भी निरन्तर अभ्यास और वैराग्य से यत्न करते हुए सिद्ध योगियों में भी कोई बिरला ही आत्म स्वरूप में भली भांति स्थित हो पाता है।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ।4।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ।5।
हे अर्जुन अब इस मार्ग के विज्ञान को मैं तुझे बताता हूँ। मेरी प्रकृति दो प्रकार की है अपरा और परा । अपरा प्रकृति के आठ भाग हैं:-
1 - पृथ्वी, 2 - जल, 3 - अग्नि, 4 - वायु, 5 - आकाश, 6 - मन, 7 - बुद्धि और 8 -अहंकार। इसे जड़ प्रकृति भी कहते हैं। दूसरी परा प्रकृति है जिससे यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है, परमात्मा की यह परा (जीव) प्रकृति सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त होकर सृष्टि को धारण किये हुए है।
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ।6।
सभी भूत इन दोनों प्रकृतियों के आपस में मिलने से उत्पन्न होते हैं। जीव प्रकृति जब स्वेच्छा से जड़ प्रकृति से मिल जाती है तब प्राणियों का जन्म होता है। मैं विश्वात्मा सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति और प्रलय हूँ अर्थात सबका कारण मैं ही हूँ।
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ।7।
हे अर्जुन मैं विश्वात्मा ही इस सृष्टि और प्रकृति का परम कारण हूँ। सृष्टि प्रकृति से उत्पन्न होती है। सृष्टि और प्रकृति अलग अलग दिखाई देती हैं परन्तु अन्त में सृष्टि प्रकृति में समा जाती है और प्रकृति मुझमें समा जाती है। यह सम्पूर्ण सृष्टि और प्रकृति मुझमें उसी प्रकार गूंथी हुई है जिस प्रकार मणियां एक धागे में आपस में गुथी रहती हैं। संक्षेप में सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्म का ही विस्तार है। ब्रह्म ही सबका परम कारण है।
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ।8।
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ।9।
सृष्टि सब ब्रह्म का ही विस्तार है और सृष्टि परा-अपरा प्रकृति से ओत प्रोत है। इसी को स्पष्ट करते हुए श्री भगवान कहते हैं; जल में रस, सूर्य में प्रभा, सभी जानने योग्य विचारों में प्रणव अर्थात ज्ञान, आकाश में शब्द, मनुष्य में मनुष्यत्व, पृथ्वी में गन्ध, अग्नि में तेज, सभी प्राणियों में जीवन और तपस्वियों में तप हूँ। इस प्रकार जड़ और चेतन प्रकृति आपस में गूंथी हुई है। दूसरे रूप में देखें सभी कुछ ब्रह्म का ही विस्तार है।
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।10।
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।11।
मैं सभी भूतों का सनातन बीज हूँ। जब न सृष्टि रहती है न प्रकृति, उस समय विशुद्ध पूर्ण ज्ञान शान्त अवस्था में रहता है, जो सृष्टि का बीज है। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि, तेजस्वियों का तेज, बलवानों में काम व राग रहित बल, समस्त प्राणियों में धर्म अनुकूल काम हूँ। संक्षेप में सभी कुछ भगवान का ही है, सभी कुछ भगवान ही हैं। ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या, जगत ब्रह्म का स्वरूप है, उसी से निकलता है उसी में समा जाता है। अतः ब्रह्म ज्ञान होने पर जगत का अस्तित्व नहीं रहता
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ।12।
हे अर्जुन, सत्त्व, रज, तम से उत्पन्न होने वाले जो भाव हैं उनका भी कारण मैं हूँ परन्तु उनमें मैं तथा वह मेरे में नहीं हैं क्योंकि परमात्मा गुणातीत हैं। परमात्मा गुणों के कारण हैं पर गुण उनमें नहीं हैं। अग्नि धुएं को जन्म देती है पर धुंए में अग्नि नहीं होती है।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ।13।
त्रिगुणात्मक तीन भावों से जिसे माया कहते हैं यह सारा जीव जगत मोहित हो रहा है। यह त्रिगुणात्मक माया मेरे और जीव के बीच आ जाती है, इस कारण जीव माया के कारण भ्रमित हो जाता है और मुझ नाश रहित आत्मतत्व को नहीं जानता।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।14।
यह त्रिगुणात्मक माया अलौकिक है और इसे पार कर पाना अत्यन्त कठिन है। रजोगुण मन में विकारों को जन्म देता है, तमोगुण भ्रम पैदा करके असत् पदार्थों को सत् समझता है, सत्त्व यद्यपि शुद्ध है परन्तु रज, तम मिलने से वह पुरुष की प्रवृत्ति का कारण होता है। इसमें प्रतिविम्बित होकर आत्मविम्ब, परम शुद्ध ज्ञान जड़ पदार्थों को प्रकाशित करता है। ऐसी परम अलौकिक और दुस्तर माया को; जो मनुष्य निरन्तर आत्मरत हैं, आत्म स्थित हुए सदा आत्म स्वरूप मुझे भजते हैं वह इस माया को पार कर जाते हैं।
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ।15।
जिन मनुष्यों का ज्ञान माया के द्वारा हरण कर लिया गया है ऐसे असुर स्वभाव धारण किए हुए अहंकारी अधम मनुष्य जो विकर्म में रत हैं अर्थात बुरे कर्म करने वाले, स्वभाव के विरूद्ध चलने वाले मुझको (आत्मतत्व) अनुभव नहीं करते। असुर उन्हें कहते हैं जो दृष्ट प्रयोजन वाले ज्ञान और दृष्ट प्रयोजन वाले कर्म से युक्त हैं। ऐसे असुर स्वभाव वाले मुझ परमात्मा को नहीं भजते हैं। मेरा अनुभव नहीं कर पाते।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।16।
हे अर्जुन चार प्रकार के उत्तम कर्म करने वाले, अर्थार्थी अर्थात धन सम्पदा पद प्रतिष्ठा चाहने वाले, आर्त (दुखी) जिज्ञासु और ज्ञानी मुझ विश्वात्मा को भजते हैं, मेरा अनुभव करते हैं।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ।17।
इन चार प्रकार के भक्तों में अनन्य प्रेम से जो मुझ परमात्मा की भक्ति करता है अर्थात सदा आत्मरत हुआ आत्म सुख अनुभव करता है ऐसा ज्ञानी भक्त अति उत्तम है। क्योंकि ज्ञानी मुझे तत्व से जानता है। इसलिए आत्म स्थित मुझे यथार्थ से जानने के कारण सदा मुझसे प्रेम करता है और वह सदा मुझे प्रिय है। वास्तव में हम दोनों एक ही हैं। ज्ञानी मेरा ही साक्षात स्वरूप है।
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ।18।
सभी मेरे भक्त चाहे वह आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु हों; सभी विशाल हृदय वाले धैर्य वान हैं परन्तु ज्ञानी साक्षात मेरा स्वरूप है क्योंकि वह निष्काम कर्मरत होकर मुझे तत्व से जानता है। सदा मुझमें आत्म रूप में स्थित रहता है। उसका मन, बुद्धि सदा मुझमें लगी रहती है। वह मुझसे जुड़ा रहता है। इसलिए उसकी गति उत्तम है अर्थात वह सर्वत्र मुझे ही देखता है। वह मेरा स्वरूप हुआ सदा मेरे में स्थित है।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ।19।
अनेक जन्मों से अभ्यास, वैराग्य द्वारा यत्न करता हुआ, अनेक बार योग भ्रष्ट होकर जन्म लेकर अन्त के जन्म में परम विशुद्ध ज्ञान को प्राप्त पुरुष समझ जाता है कि सब कुछ आत्मा ही है, सभी कुछ भगवान ही हैं। इस प्रकार सृष्टि के कण कण में व्याप्त वह ज्ञानी स्वयं को स्वयं से देखता हुआ मुझे भजता है, ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ।20।
हे अर्जुन:- इस संसार में सकामी पुरुष जो अनेक भोग और इच्छाओं के वशीभूत हैं, जिनका ज्ञान माया द्वारा हर लिया गया है, अपने अपने स्वभाव के वशी भूत हो भिन्न भिन्न नियमों का पालन करते हुए अर्थात पूजा विधि, पूजा सामग्री आदि से देवी देवताओं का भजन पूजन करते हैं।
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ।21।
जो जो सकामी भक्त जिस जिस देवी देवता के स्वरूप का श्रद्धा से भजन पूजन करना चाहता है उस उस भक्त की श्रद्धा मैं उसी देवी देवता के प्रति स्थिर कर देता हूँ।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ।22।
वह सकामी भक्त श्रद्धा से युक्त होकर उस देवी देवता का भजन पूजन करते हैं और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए इच्छित भोगों को प्राप्त करते हैं अर्थात जिस फल की इच्छा वे रखते हैं, मेरे बनाये नियमानुसार उन्हें वह फल उस देव पूजन से प्राप्त होता
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ।23।
परन्तु यह सकामी सभी भक्त अल्प बुद्धि के हैं तथा इनको देव पूजन से मिलने वाला फल भी नाशवान है। क्योंकि संसार की सभी वस्तु मरण धर्मा हैं। ये देव पूजन करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं परन्तु जो मेरे भक्त हैं उन्हें मेरी पूजा का फल मैं अर्थात आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ।24।
फल की इच्छा रखने वाले बुद्धिहीन मनुष्य मेरे परम उत्तम अविनाशी परम भाव को नहीं जानते हैं। इसी कारण मैं आत्म रूप जो मन बुद्धि इन्द्रियों से परे हूँ, को व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ देह धारी समझते हैं अर्थात योगमाया के आश्रित ईश्वर के स्वरूप को न समझने वाले सामान्य जन उन्हें मनुष्य ही समझते हैं क्योंकि उनके यथार्थ स्वरूप को समझने की न उनकी योग्यता होती है न दृष्टि। इसी प्रकार आत्मज्ञानी को भी जान पाना अत्यन्त कठिन है, उसके प्रति भी लोग व्यक्तिभाव ही रखते
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ।25।
योगमाया ज्ञान का हरण कर लेती है इसलिए मैं योगमाया के कारण छिपा रहता हूँ। प्रत्यक्ष मेरा मानव शरीर होता है, मेरे दिव्य स्वरूप आत्मतत्व को वह नहीं जान पाते। ऐसे अज्ञानी मुझ अविनाशी, जन्म रहित परमेश्वर को जन्म लेने वाला, मरने वाला समझते हैं। यही कारण था भगवान श्री कृष्ण चन्द्र को उनके काल में कई राजा-प्रजा आदि उन्हें अपनी तरह का मानव समझते थे तथा यहीं विकार आज भी कई मनुष्यों में है।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ।26।
मैं विशुद्ध पूर्ण ज्ञान, नित्य होने के कारण पूर्व में व्यतीत हुए वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सभी भूतों को जानता हूँ परन्तु मुझे कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसे स्वरूप अनुभूति नहीं हुयी हो, नहीं जानता।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ।27।
हे अर्जुन इस संसार में इच्छा और द्वेष का कारण मनुष्य का शरीर ओर अहंकार है। इसी इच्छा और द्वेष के कारण संसार में सुख और दुख हैं और सभी संसार के लोग इनके पीछे पागल हुए दौड़ रहे हैं क्योंकि यह मनुष्य की बुद्धि को भ्रमित कर देते हैं और मनुष्य कभी भी अपने श्रेय को नहीं प्राप्त कर पाता है।
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ।28।
परन्तु जिन योगभ्रष्ट पुरुषों का पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण पुण्योदय हुआ वे कर्म बन्धन से मुक्त स्वाभाविक रूप से राग द्वेष से मुक्त हो जाते हैं और दृढ़ निष्चयी होकर सूक्ष्म बुद्धि द्वारा मुझे अनुभव करते हैं अर्थात मुझे भजते हैं।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ।29।
जो मनुष्य मेरी शरण आकर वृद्धावस्था, जन्म, मृत्यु से छूटने का यत्न करते हैं वह यत्न करते हुए ब्रह्म को, स्वभाव को, और सम्पूर्ण कर्म को जान जाते हैं। कर्म स्वभाव और ब्रह्म को जानकर अपना लक्ष्य ब्राह्मी स्वरूप को प्राप्त करने में सतत् यत्न करते हैं।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ।30।
जो पुरुष मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित अन्त काल में भजते हैं, उत्पत्ति विनाश वाले पदार्थ जैसे शरीर, सृष्टि के तत्व अधिभूत हैं, जीवात्मा अधिदैव कहलाता है, परमात्मा अथवा विशुद्ध आत्मा अधियज्ञ है, जो इस बात का अनुभव कर लेता है वह सदा मुझ आत्म स्वरूप अधियज्ञ में अपना चित्त स्थापित कर लेते हैं क्योंकि हर मनुष्य परम श्रेय को पाना चाहता है और आत्मा ही परम श्रेय है। अतः तत्व से मुझे जान कर आत्मरत रहते हैं।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः 7
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