Saturday, September 10, 2011

गीता - आत्मगीता - अध्याय 2 (हिन्दी भाष्य ) - सांख्ययोग - इस आत्मा का न जन्म है न मरण है। न यह जन्म लेता है न किसी को जन्म देता है। हर समय नित्य रूप से स्थित है, सनातन है ।


                                                          आत्मगीता                                
                     अथ द्वितीयोऽध्यायः–सांख्ययोग -  भाष्यकार– प्रो. बसन्त प्रभात जोशी

संजय उवाच

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌ ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः। 1।

संजय बोले हे राजन्, युद्ध भूमि में करुणा से भरा हुआ जिसके आंखों से आंसू बह रहे थे व्याकुल नेत्र वाला, विषाद युक्त अर्जुन के प्रति मंद मंद मुस्कराते हुए श्री भगवान बोले।

श्रीभगवानुवाच

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमेसमुपस्थितम्‌ ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।2।

हे अर्जुन, तुझे यह असमय में मोह किस कारण से व्याप्त हो गया है क्योंकि इस प्रकार मोह जनित होकर कर्तव्य कर्म को छोड़ना न तो श्रेष्ठ पुरुषों का आचरण है, न स्वर्ग देने वाला है और न यश को बढ़ाने वाला है।

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ।3।

हे अर्जुन, तू क्लैव्यता (एक प्रकार की दिमागी नपुंसकता) को प्राप्त मत हो, यह बिल्कुल भी उचित नहीं है। हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर तू युद्ध के लिए खड़ा हो जा।

अर्जुन उवाच

कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ।4।

हे श्रीकृष्ण, मैं इस युद्ध भूमि में अपने पितामह भीष्म, अपने गुरू द्रोणाचार्य के प्रति कैसे युद्ध करूं। यह दोनों श्रेष्ठ पुरुष मेरे अति पूज्यनीय हैं।

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो  भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तुगुरूनिहैव भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌ ।5।

इन परम श्रेष्ठ गुरूजनों को न मारकर इस संसार में भिक्षा मांगकर अन्न खाना ज्यादा अच्छा है और इन गुरूजनों को मारकर इस संसार में खून से लथपथ धन सम्पदा राज्य और भोगों को ही मैं भोगूँगा।

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ।6।

मैं यह भी नहीं जानता कि मेरे लिए युद्ध करना श्रेष्ठ है अथवा युद्ध न करना श्रेष्ठ है, मैं यह भी नहीँ  जानता कि हम युद्ध जीतेंगे या कौरव युद्ध जीतेंगे। जिनको मारकर मैं जीना नहीं चाहता हूँ  वे कौरव इस युद्ध भूमि में हमारे मुकाबले में खड़े हैं ।

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌ ।7।

मेरे अन्दर कायरता रूपी दोष उत्पन्न हो गया है, धर्म के विषय में मेरी बुद्धि भ्रमित हो गयी है। इसलिए मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित और परम कल्याण कारक मार्ग है वह मेरे लिए कहिए। हे भगवन, कृपया मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकारते हुए मुझ शरण में आये हुए को हे श्री गुरु, मुझे शिक्षा देकर मेरे मति भ्रम को दूर कीजिए।

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌ ।
अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌ ।8।

शमशान वैराग्य को प्राप्त हुए अर्जुन श्री भगवान से कहते हैं, हे श्री कृष्ण, मैं शत्रुओं से रहित भूमि, धन धान्य, राज्य और यहाँ तक कि देवताओं पर भी अधिकार कर लूँ  तो भी इस उपाय को नहीं देखता कि कोई भी वस्तु मेरे शोकाकुल मन की इस व्यथा को दूर कर सके।

संजय उवाच

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।9।

संजय बोले हे राजन्, शत्रुओं को जीतने वाला यहाँ तक कि निद्रा को भी जीतने वाला परम प्रतापी और योग साधक अर्जुन, मैं युद्ध नहीं करूंगा यह स्पष्ट कहकर चुप हो गये।

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः ।10।

हे भरत श्रेष्ठ राजन्, श्री भगवान कृष्ण ने विषाद से व्याकुल रोते हुए अर्जुन से हंसते हुए उसकी मति भ्रम दूर करने के लिए यह वचन बोले।

श्री भगवानुवाच

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ।11।

श्री भगवान बोले - हे अर्जुन, तू शोक न करने वाले मनुष्य के लिए शोक करता है और विद्वानों के जैसे वचनों को कहता है, परन्तु जो विद्वान हैं, ज्ञानी हैं वह किसी भी मनुष्य के लिए शोक नहीं करते चाहे उनमें प्राण हैं अथवा प्राण चले गये हैं।

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌ ।12।

आत्मा की नित्यता बतायी गयी है। आत्मा नित्य है, अजर है, अमर है। उसका कभी नाश नहीं होता है। जीव भी आत्मा का ही स्वरुप है अतः वह भी नित्य है। जीव तत्व को कोई नष्ट नहीं कर सकता। सृष्टि के सभी जीव पहले भी थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे।

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ।13।

देह और इन्द्रिय तत्व नष्ट होने वाले हैं, मृत्यु धर्मा हैं। जीवतत्व अमर है। नाश रहित है। शरीर में हम बालक, युवा और वृद्धावस्था देखते हैं, इन सभी अवस्थाओं में देही नित्य स्थित रहता है। इसी प्रकार जीवात्मा के अनेक शरीर बदलते रहते हैं, परन्तु वह सदा रहता है। जो पुरुष आत्मा के सदा एक समान रहने वाले स्वरुप को समझ जाता है, उसकी बुद्धि विचलित नहीं होती और वह साँसारिकता में मोहित नहीं होता।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ।14।

मनुष्य की इन्द्रियां उसकी चेतना को, संसार की ओर प्रवाहित करती हैं। इन्द्रियों की रुचि विषयों की ओर होती है, इसी कारण सुख दुःख, सर्दी गर्मी का प्रभाव हमारे अन्तःकरण पर पड़ता है। जो वस्तु हमे प्रिय लगती है उससे सुख प्राप्त होता है तथा जो हमें अप्रिय लगती है उससे दुख प्राप्त होता है। परन्तु यह सभी इन्द्रियां और उनके विषय उत्पत्ति व विनाश शील हैं, इसलिए अनित्य हैं अतः इस सच्चाई को जानकर उन्हें सहन करना ही उचित है।

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।15।

विषयों के आधीन जो पुरुष नहीं होता है, सुख और दुःख में जो समान रहता है वह अमृत तत्व के योग्य होता है। उसका चित्त पूर्णतया शान्त हो जाता है। यही क्षीर सागर है।

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ।16।

सृष्टि का मूल तत्व सत् है, वही नित्य है, सदा है। असत् जिसे जड़ या माया कहते हैं, यह वास्तव में है ही नहीं। जब तक पूर्ण ज्ञान नहीं हो जाता तब तक सत् और असत् अलग अलग दिखायी देते हैं। ज्ञान होने पर असत् का लोप हो जाता है वह ब्रह्म में तिरोहित हो जाता है। उस समय न दृष्टा रहता है न  दृश्य। केवल आत्मतत्व जो नित्य है, सत्य है, सदा है, वही रहता है।

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌ ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ।17।

यह आत्मा सदा नाश रहित है । आत्मा ने ही सम्पूर्ण सृष्टि को व्याप्त किया है। सृष्टि में कोई भी स्थान ऐसा नहीं है जहाँ आत्मतत्व न हो। इस अविनाशी का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ।18।

जीवात्मा इस देह में आत्मा का स्वरूप होने के कारण सदा नित्य है। इस जीवात्मा के देह मरते रहते हैं। अतः जीवन संग्राम से क्या घबराना।

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌ ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ।19।

जब देह मरता है तो समझा जाता है सब कुछ नष्ट हो गया परन्तु ऐसा नहीं होता है। इसलिए भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, जो इसे मारने वाला और मरणधर्मा मानता है, वह दोनों नहीं जानते । यह आत्मा न किसी को मारता है, न मरता है। आत्मा अक्रिय अर्थात क्रिया रहित है अतः किसी को नहीं मारता । नित्य अविनाशी है अतः किसी भी काल में नहीं मरता है।

न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।20।

इस आत्मा का न जन्म है मरण है। न यह जन्म लेता है न किसी को जन्म देता है। हर समय नित्य रूप से स्थित है, सनातन है । इसे कोई नहीं मार सकता । केवल इसके देह नष्ट होते हैं ।

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌ ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌ ।21।

आत्मा को जो पुरुष नित्य, अजन्मा, अव्यय जानता है, उसे बोध हो जाता है कि आत्मा जो उसमें और दूसरे में है वह नित्य है। फिर वह कैसे किसी को मारता है या मरवा सकता है।

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।22।

जीवात्मा के शरीर उसके वस्त्र हैं वह पुराने शरीरों को उसी प्रकार त्याग कर शरीर धारण करता है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है।


नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।23।

इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते हैं, इसे आग में जलाया नहीं जा सकता, जल इसे गीला नहीं कर सकता तथा वायु इसे सुखा नहीं सकती। यह निर्लेप है, नित्य है, शाश्वत है।

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ।24।

आत्मा को छेदा नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता, गीला नहीं किया जा सकता, सुखाया नहीं जा सकता, यह आत्मा अचल है, स्थिर है, सनातन है।

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ।25।

यह आत्मा व्यक्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि आत्मा अनुभूति का विषय है। इसका चिन्तन नहीं किया जा सकता क्योंकि यह बुद्धि से परे है। यह आत्मा विकार रहित है क्योंकि यह सदा  अक्रिय है। आत्मतत्व को बताते हुए भगवान श्री कृष्ण चन्द्र अर्जुन से कहते हैं कि जैसा मैंने बताया वैसे आत्मा को जानकर तुझे शोक नहीं करना चाहिए।

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌ ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ।26।

परन्तु इस देह में आत्मा क्रियाशील और मरता जन्म लेता  दिखायी देता है इसलिए अर्जुन की बुद्धि में उपजे इस संशय को दूर करने के लिए भी भगवान श्री कृष्ण चन्द्र कहते हैं, यदि तू इस आत्मा को सदा जन्म लेने वाला और मरने वाला मानता है फिर शोक क्यों ?

जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।26।

क्योंकि जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु होगी और जो मरगया है उसका जन्म निश्चित है। इसे रोका नहीं जा सकता । यह अपरिहार्य है। अतः तुझे शोक नहीं करना चाहिए।

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ।28।

सभी प्राणी जन्म से पहले दिखायी नहीं देते तथा मृत्यु के बाद भी नहीं दिखायी देते हैं. यह बीच में प्रकट होते हैं फिर शोक क्यों

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌ ।29।

आत्मतत्त्व एक आश्चर्य है, आश्चर्य इसे इसलिए कहा है कि अक्रिय होते हुए भी यह कुछ करता हुआ दिखायी  देता है। यह निराकार है, अजन्मा है, फिर भी जन्म लेते हुए, मरते हुए  दिखायी देता है।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ।30।

आत्मा इस देह में अवध्य है अर्थात इसे कैसे ही, किसी भी प्रकार, किसी के द्वारा नहीं मारा जा सकता क्योंकि यह मरण धर्मा प्राणी अथवा पदार्थ नहीं है।

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ।31।

हे अर्जुन, अपने क्षत्रिय स्वभाव के कारण भी तुझे इस युद्ध भूमि में अपने शत्रुओं से भय नहीं मानना चाहिए क्योकि यहाँ किसी भी क्षत्रिय के लिए युद्ध से बढ़कर कोई भी कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है।

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌ ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌ ।32।

हे अर्जुन, तू बड़ा भाग्यवान है क्योंकि इस प्रकार के युद्ध को, जिसका परिणाम परम कल्याण कारक है, भाग्यवान क्षत्रिय ही पाते हैं।

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ।33।

फिर भी यदि तू अपने स्वभाव के अनुरूप इस धर्म युद्ध को नहींकरेगा तो अपने स्वभाव से विरत हो जायेगा और अपने सम्मान को खो कर पाप का आचरण करेगा और दुष्परिणाम भोगेगा।

अकीर्तिं चापि भूतानि
कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌ ।
सम्भावितस्य चाकीर्ति-
र्मरणादतिरिच्यते ।34।

संसार के लोग लम्बे समय तक तेरी अपयश गाथा कहते रहेंगे, तुझे कायर, भगौड़ा, नपुंसक आदि कहेंगे और किसी भी सम्मानीय पुरुष के लिए अपकीर्ति, मरने से अधिक बढ़कर है।

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌ ।35।

तू संसार में अभी तक परम सम्माननीय है परन्तु अपने इस आचरण के कारण उन लोगों की नजरों में तू तुच्छ हो जायेगा। महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से भागा हुआ मानेंगे।

अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌ ।36।

तेरे शत्रु लोग तेरे पराक्रम की तेरे सामने और पीठ पीछे बहुत से न कहने वाले वचन अर्थात अपशब्द से निन्दा करेंगे, अब तू ही सोच कि उससे अधिक दुःख तेरे लिए क्या होगा।

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌ ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ।37।


इस युद्ध में यदि तू मारा जाता है तो अपने स्वभाव रत कर्म के कारण, धर्म आचरण के कारण तू स्वर्ग को प्राप्त होगा और यदि तू इस युद्ध को जीतता है तो राज्य सुख आदि का भोग करेगा। इसलिए अपनी क्लैव्यता को त्यागकर अपने स्वभाव का आचरण कर और युद्ध के लिए खड़ा हो जा।

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।38।

आत्मा अबध्य है और नित्य है। देह को मरना है तथा एक देह के बाद दूसरा देह, यह क्रम चलना है। अतः भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन जो कुछ भी है क्षणिक है अतः सुख दुःख, जय पराजय, हानि लाभ को समान समझ और समत्व योग में स्थित हो जा। जो हो रहा है उसे होने दे, कोई सारोकार मत रख। सम हो जा।

एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।
बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ।39।

भगवान श्री कृष्ण चन्द्र द्वारा धनुर्धर अर्जुन को ज्ञान योग जिसे सांख्य योग अथवा सन्यास योग कहा है, का ज्ञान दिया। अब कर्म योग का ज्ञान देने जा रहे हैं जिसे जानकर अथवा जिस बुद्धि से युक्त होकर प्राणी कर्म बन्धन से मुक्त हो जाता है।

यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌ ।40।

इस कर्म योग में बीज का नाश नहीं होता, अर्थात लौकिक कार्य भी होते हैं, उनका सुख भी होता है तथा कर्म दोष भी नहीं होता है। समता योग स्वतः सिद्ध होने लगता है और मोक्ष का मार्ग सरल हो जाता है।

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌ ।41।

इस कर्म योग की साधना के लिए एक निश्चयात्मक बुद्धि काहोना आवश्यक है। निश्चयात्मक बुद्धि से तात्पर्य है उसकी बुद्धि आत्मतत्व में स्थित हो। आत्म ज्ञान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। इसे हरि बोधमयी बुद्धि भी कहते हैं। सब कुछ ईश्वर का है अतः उसी को अर्पण करते हुए सभी कर्म करे । सुख दुख में समरूप से स्थित रहे। ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’ उपनिषद वचन की श्री भगवान ने पुष्टि की है।

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ।42।

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्‌ ।
क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ।43।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌ ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ।44।

श्री भगवान अर्जुन से बोले जो मनुष्य सदा भोगों में लगे रहते हैं जिन्हें नित नवीन भोग चाहिए, जो कर्मफल के प्रशसंक हैं और विभिन्न भोगों के लिए वेदों के बताये हुए मार्ग में चलते हैं, उनके लिए स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। उनकी बुद्धि यहाँ भी भोगों में रत रहती है और मरने के बाद भी उन्हें स्वर्ग आदि के भोग चाहिए। ऐसे अविवेकी जन भोगों की प्राप्ति के लिए मीठी मीठी वाणी का प्रयोग करते हैं और ऐसी विद्या और वाणी से जिनकी बुद्धि का हरण हो गया है वह भोग ऐश्वर्य को प्राप्त करने वाली, संसार बन्धन में बांधने वाली विद्या को सबसे श्रेष्ठ मानते हुए भोग ऐश्वर्य के लिए बताई वेद वाणी में आसक्त पुरुषों की बुद्धि आत्म ज्ञान की ओर नहीं होती। वह आत्मतत्व परमात्मा को नहीं जान पाते।

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌ ।45।

वेदों में अधिकांशतः कर्म काण्ड का प्रतिपादन हुआ है अतः वेद का विषय सत्त्व, रज, तम से युक्त है। परन्तु हे अर्जुन तूने वेद विषय में ध्यान नहीं देना है। तुझे स्वाधीन अन्तः करण वाला होकर कर्म फल को न चाहते हुए, नित्य आत्मा में स्थित होना है। कर्म काण्ड आसक्ति योग का प्रतिपादन करते हैं, जबकि तुझे अनासक्त होना है।

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ।46।

अपार जलराशि के प्राप्त होने पर ताल तलैया का प्रयोजन सीमित हो जाता है उसी प्रकार जो विद्वान आत्मतत्व को जान लेते हैं उनका वेदों में प्रयोजन सीमित हो जाता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ।47।

तेरा कर्म में अधिकार हो अर्थात तेरा कर्म में नियन्त्रण हो। कर्म नियन्त्रण होने पर ही फल की इच्छा में नियन्त्रण हो जाता है । कर्म फल की इच्छा नहीं होनी है, फल की इच्छा से कर्म और उसके फल में आसक्ति हो जाती है। मन सदैव उस ओर दौड़ता है। आसक्त व्यक्ति का मन में नियन्त्रण नहीं रहता है। कर्म फलका हेतु भी नहीं होना है और कर्म करने में आसक्ति भी नहीं होनी है। किसी कर्म करने का तू साधन भी मत बन, यह मत सोच तेरे बिना यह कर्म नहीं होगा। कर्म बन्धन के डर से कर्म त्याग दे ऐसा भी नहीं करना है। कर्म अनासक्त होकर, कर्म अपने नियन्त्रण में रखते हुए करना है।

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।48।

कर्म फल की आसक्ति को त्याग कर, यदि कार्य सिद्ध हो जाय तो ठीक है और यदि बिगड़ जाय तो ठीक है, दोनो में सम होकर आत्मा (ईश्वर) से अपने को प्रतिपल जुड़ा हुआ महसूस करना है अर्थात निरन्तर आत्म योग में स्थित होता हुआ सभी कर्मों को कर। यही समत्व योग है।

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ।49।

सकाम कर्म अत्यन्त निम्न श्रेणी के हैं। चाहे सकाम कर्म ईश्वर उपासना भक्ति अथवा योग क्यों न हो। बुद्धि योग अत्यन्त श्रेष्ठहै। बुद्धि योग का तात्पर्य है निरन्तर बुद्धि से आत्म स्थित रहना। इसे ही परमात्मा से जुड़े रहना कहते हैं। बुद्धि योग का आश्रय लेकर ही कर्म करना है। सकाम कर्मी अत्यन्त दीन हैं।

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌ ।50।

बुद्धि से जो आत्मा में स्थित है उसके लिए पाप और पुण्य निरर्थक हो जाते हैं, क्योंकि वह अकर्ता हो जाता है। यही समता योग है। इस बुद्धि योग द्वारा ही कर्म बन्धन से छूटा जा सकता है। बुद्धि ही ऐसा माध्यम है जिससे अनासक्त होकर शरीर से कर्म किये जा सकते।

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌ ।51।

ज्ञानवान ही बुद्धि द्वारा कर्म फल को त्याग करने में सक्षम होते हैं। अनासक्त होते ही चित्त की उद्विग्नता समाप्त हो जाती है और मन शान्त हो जाता है। इसलिए बुद्धियोगी जन्म बन्धन सेमुक्त होकर निर्विकार परम पद को प्राप्त करते हैं।

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।52।

मोह ही संसार है, मोह के त्यागते ही तुझे संसार तथा उसके सभी भोगों से स्वतः वैराग्य हो जायेगा।

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ।53।

अनेक श्रुति प्रतिपादित सिद्धान्तों से उपलब्ध जब तेरी बुद्धि समाधि में स्थित हो जायेगी तब तू समता योग को प्राप्त होगा अर्थात संसार में प्रचलित किसी एक अथवा बहुत विधियों का सहारा लेकर निरन्तर साधना करते हुए जब तेरी बुद्धि समाधि में अचल और स्थित हो जायेगी तभी तेरा आत्मा से योग हो जायेगा, तू आत्मा में स्थित हो जायेगा।

अर्जुन उवाच

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌ ।54।

अर्जुन वोले हे कृष्ण, स्थितप्रज्ञ मनुष्य के क्या लक्षण हैं? उसको कैसे पहचाना जा सकता है, वह कैसे चलता बोलता है? वह स्थिर बुद्धि पुरुष किस स्थिति में रहता है?

श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌ ।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।55।

जिस समय मनुष्य मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं का त्याग कर देता है, उस समय स्वतः बुद्धि स्थित हो जाती है और वह आत्मा से आत्मा में संतुष्ट रहता है। वही स्थित प्रज्ञ कहा जाता है।

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।56।

जिसका मन दुखः में उद्विग्नता को प्राप्त नहीं होता, जिसकी सुखों से कोई प्रीति नहीं है, दोनो अवस्थाओं में जो निस्पृह है, जिसके राग, क्रोध, भय समाप्त हो गये हैं, जो अनासक्त हो गया है, उसकी बुद्धि स्थिर कही जाती है।

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌ ।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।57।

जो इस संसार में उदासीन होकर विचरता है, सभी वस्तुओं में वह स्नेह रहित होता है शुभ और अशुभ की प्राप्ति होने पर उसे न हर्ष होता है न वह द्वेष रखता है, वह स्थित प्रज्ञ कहा जाता है।

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।58।

जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट कर अन्दर कर लेता है वैसे ही जब मनुष्य इन्द्रियों  को सब विषयों से समेट लेता है, तब स्थित प्रज्ञ कहा जाता है।

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते ।59।

जो मनुष्य इन्द्रियों से विषयों को ग्रहण नहीं करता है उस पुरुष के विषय निवृत्त हो जाते हैं। किसी भी इन्द्रिय को रोककर उसके विषय को हठ पूर्वक ग्रहण नहीं करने से वह विषय निवृत्त हो जाता है परन्तु उस विषय में आसक्ति निवृत्त नहीं होती है। आसक्ति, स्थित प्रज्ञ पुरुष की परम आत्मा में स्थित होने पर ही निवृत्त होती है।

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ।60।

पुरुष में आसक्ति इतनी प्रबल है कि यह आसक्ति नाश  न होने के कारण चंचल स्वभाव वाली इन्द्रियां, रात दिन प्रयत्न करने वाले बुद्धिमान साधक के मन को अपने प्रभाव से बल पूर्वक हर लेती है अर्थात यत्नशील बुद्धिमान पुरुष भी इन्द्रियों के वेग के सामने लाचार हो जाता है।

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।61।

अतः जो मनुष्य सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके (मुझमें) अर्थात आत्मतत्व की साधना में स्थित रहता है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ।62।

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। यदि किसी एक इन्द्रिय विषय का थोड़ा भी चिन्तन हो तो निरन्तर अभ्यासी पुरुष भी उस विषय की ओर बहने लगता है। सकामी पुरुषों की अनेक इच्छायें और उनकी आसक्ति से उत्पन्न संवेग का अनुमान लगाया जा सकता है। आसक्ति से काम उत्पन्न होता है, कामना पूर्ति में यदि बाधा होती है तो क्रोध उत्पन्न होता है।

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।63।

क्रोध से सम्मोह पैदा होता है अर्थात बुद्धि सम्मोहित होकर अविचार उत्पन्न कर देती है। सम्मोह से स्मृति नष्ट हो जाती है। स्मृति नष्ट होने से बुद्धि का नाश हो जाता है और जिसकी बुद्धि का नाश हो जाय वह अपनी स्वरुप स्थिति को कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता और जिस स्थिति को उसने प्राप्त भी किया है उससे गिर जाता है।

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌ ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ।64।

जिस पुरुष का मन उसके वश में है तथा सभी इन्द्रियां जिसके वश में है, उसे न किसी से राग है न किसी से द्वेष अर्थात जिसकी आसक्ति का नाश समूल रुप से हो गया है ऐसा पुरुष संसार के समस्त विषयों को राजा जनक के समान भोगता हुआ भी आत्मानन्द को प्राप्त होता है। उसका अन्तःकरण निरन्तर प्रसन्न रहता

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ।65।

जिसका चित्त निर्मल हो जाता है, जिसका अन्तःकरण स्वतः प्रफुल्लित रहता है उसके सभी दुःख नष्ट हो जाते हैं और प्रसन्न चित योगी की बुद्धि शीघ्र  ही आत्म स्थित हो जाती है और आत्म स्वरूप में भलीभांति स्थिर हो जाती है।

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌ ।66।

जो मनुष्य इन्द्रियों का दास है अर्थात जो कामनाओं का दास है और जिसका मन उसके वश में नहीं है अर्थात नित नई कामनाएं करता है, उस मनुष्य की बुद्धि निश्चयात्मक नहीं होती वह भटकती रहती है। एक बुद्धि न होने से अयुक्त मनुष्य के अन्तः करण में आत्म भावना भी नहीं होती। आत्म भाव का अभाव होने से मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती । कबीर कहते हैं ‘शान्ति भई जब गोविन्द जान्या’ और जिसे शान्ति नहीं है, वहाँ आनन्द कैसे हो सकता है।

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।67।

विषयों में विचरती हुयी इन्द्रियों के साथ अथवा किसी एक इंद्री के साथ मन रहता है, वह एक इन्द्री पुरुष की बुद्धि का हरण उसी प्रकार कर लेती है जैसे पानी में नाव का वायु हरण कर लेती है अर्थात साधक पथ भ्रष्ट हो जाता है। नाव विपरीत दिशा की ओर वायु वेग से बहने लगती है, उसी प्रकार साधक की बुद्धि विपरीत हो जाती है।

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।68।

अतः इन्द्रियों को वश में करना सबसे ज्यादा आवश्यक है। इन्द्रियों को वश में करने के लिए महर्षि पातंजलि ने अष्टांगयोग बताया है। जिस साधक की मन सहित समस्त इन्द्रियां सब प्रकार से वश में हैं उसकी बुद्धि स्थिर है, उसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ।69।

जब संसार के समस्त प्राणी सोते हैं तब स्थितप्रज्ञ योगी आत्म ज्ञान में जागता है। सुसुप्ति में भी वह योगी आत्म रस में निरन्तर मगन रहता है। जब इस संसार के समस्त प्राणी जागते हैं अर्थात विषय व इद्रियों के वश में हुए संसार के कर्म करते हैं, स्थितप्रज्ञ मुनि के लिए वह समय रात्रि के समान है अर्थात वह संसार से अनासक्त हुआ कर्मों में विचरता है।

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌ ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ।70।

नदी नालों का समस्त पानी समुद्र में समा जाता है फिर भी समुद्र अचल रहता है, उसमें बाढ़ नहीं आती, वह जस का तस बना रहता है। इसी प्रकार स्थित प्रज्ञ पुरुष में भी संसार के समस्त कर्म, समस्त भोग समा जाते हैं, वह परम शान्ति, परम आनन्द को प्राप्त होता है। जो व्यक्ति भोगों को चाहने वाला है उसे शान्ति नहीं प्राप्त होती है क्योंकि कामना में विघ्न पड़ने से उसका चित्त उद्विग्न रहता है।

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ।71।

जिस पुरुष ने अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग दिया है जो सांसारिक ममता, मोह से रहित हो गया है, उदासीन है, जो अहंकार से रहित है, जिसे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है, ऐसा आत्मवान पुरुष परम शान्ति, परम आनन्द को प्राप्त होता है।

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ।72।

आत्म स्थित ही ब्राह्मी स्थिति है। जब बुद्धि और आत्मा एक हो जाती है तब यह ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है। जो भी योगी इस ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त हो जाता है, उसे सांसारिक और परमार्थिक मोह व्याप्त नहीं होते और अन्त में आत्म स्थित हुआ वह पुरुष आत्मा को ही प्राप्त होता है। इसे ही ब्रह्म निर्वाण कहते हैं।
         
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे   श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥2॥






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