Tuesday, September 20, 2011

गीता - आत्मगीता - अध्याय १४ - त्रिगुणयोग (हिन्दी भाष्य ) / भाष्यकार बसन्त


हे अर्जुन, जिसे ब्रह्म कहा गया है वह ब्रह्म ही यह आत्मा (मैं हूँ) है। मैं आत्मा अमृत हूँ अर्थात परम विशुद्ध ज्ञान हूँ जिसका कभी नाश नहीं होता। मैं ही स्वभाव (धर्म) का आश्रय हूँ।

प्रकृति अर्थात ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति के भिन्न भिन्न मात्रा में कार्य करने से गुण उत्पन्न होते हैं।
                               

                                                आत्मगीता - भाष्यकार- प्रो. बसन्त प्रभात जोशी

                                                          अथ चतुर्दशोऽध्यायः त्रिगुणयोग

श्रीभगवानुवाच

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम्‌ ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ।1।

भगवान श्री कृष्ण चन्द्र अर्जुन से बोले - अब तुझे ज्ञानों में भी सर्वश्रेष्ठ ज्ञान को फिर से बताता हूँ क्योंकि अर्जुन ने प्रभु का विराट स्वरूप देखने पर भी मनुज रूप देखने की इच्छा की, जिससे प्रभु समझ गए अभी इसके मोह और कर्म बन्धन पूर्ण रूपेण नष्ट नहीं हुए हैं अतः फिर से आत्म ज्ञान को यहाँ  बताते हैं जिसे जानकर माया के बन्धन से मुनि मुक्त हो जाते हैं और परम सिद्धि आत्मतत्व को पाते हैं।

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ।2।

इस ज्ञान को अपने अन्तःकरण में स्थित करके आत्म स्वरूप हुए मनुष्य सृष्टि के प्रारम्भ में जन्म नहीं लेते और प्रलयावस्था में व्याकुल नहीं होते क्योंकि आत्मज्ञान हो जाने के कारण उनके कर्म बन्धन क्षय हो जाते हैं। यदि वह जन्म भी लेते हैं तो निज इच्छा से प्रकट होते हैं। जन्म मृत्यु के भय से वह सदा सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌ ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ।3।

जिस प्रकार संसार में प्राणियों का जन्म स्त्री-पुरुष के संयोग से होता है उसी प्रकार यह मूल प्रकृति (महत् ब्रह्म) गर्भाधान का स्थान है और मैं परब्रह्म परमात्मा इस प्रकृति में गर्भ को स्थापित करता हूँ। तब जड़ और चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ।4।

इस जगत में भिन्न भिन्न योंनियों में भिन्न भिन्न शरीर धारी उत्पन्न होते हैं। व्यक्त प्रकृति उन सब की गर्भधारण करने वाली माता है और मैं आत्मा उन सब में बीज स्थापित करने वाला पिता हूँ। आत्मा ही पति है, प्रकृति पत्नी, और जगत संतान है।

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌ ।5।

प्रकृति अर्थात ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति के भिन्न भिन्न मात्रा में कार्य करने से गुण उत्पन्न होते हैं। इन्हें तीन भागों में विभाजित किया है। यह हैं सत्त्व, रज, तम। सत्त्व में ज्ञान शक्ति अधिक होती है, रज में क्रिया शक्ति अधिक होती है और तम में ज्ञान शक्ति लगभग लुप्त होती है, क्रिया शक्ति अति अल्प होती है। यह तीनों गुण अविनाशी अव्यक्त आत्मतत्व परमात्मा को इस शरीर में मोहित कर बांधते हैं। प्रकृति के गुणों के कारण ही आत्मा में जीव भाव उत्पन्न होता है।

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्‌ ।
सुखसङ्‍गेन बध्नाति ज्ञानसङ्‍गेन चानघ ।6।

हे अर्जुन सुन, प्रकृति (माया) किस प्रकार अविनाशी आत्मा को अपने जाल में फंसाती है। सतोगुण सुख और ज्ञान के माध्यम में अविनाशी आत्मा को फंसाता है अर्थात वह ज्ञान देता है और ज्ञान का अहंकार भी उत्पन्न करता है और ज्ञानी होने का अहंकार उसे मिथ्या सुख से भ्रमित कर देता है। वह सच्चे ज्ञान व सच्चे आनन्द को भूल जाता है।

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्‍गसमुद्भवम्‌ ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्‍गेन देहिनम्‌ ।7।

रजोगुण सदा आत्मा को बहलाता है क्योंकि राग रूप रजोगुण का जन्म कामना और आसक्ति से होता है और संसार के विभिन्न रूपों की कामना उनमें आसक्ति प्राप्त होने पर बढ़ती ही जाती है। पहले थोड़ा मिला उसका सुख उठाया, फिर ज्यादा की इच्छा हुयी, आसक्ति बढ़ी, उसके लिए कार्य बढ़े (कर्म की इच्छा बढ़ी) और फल से सम्बन्ध बढ़ा, इस प्रकार देह स्थित आत्मा को जीव भाव की प्राप्ति होती है और वह जीवात्मा शरीर से बंध जाता है।

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्‌ ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ।8।

हे अर्जुन, तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है, यह आत्मा को पूर्ण रूपेण भ्रम में डाल देता है, वह अपना स्वरूप पूर्णतया भूल कर जीव भाव को प्राप्त इस शरीर को ही अपना स्थान, अपना स्वरूप मान बैठती है। प्रमाद, आलस्य और नींद इस तमोगुण के हथियार हैं, इनके द्वारा मन मूढ़ बन जाता है, बुद्धि भ्रमित हो जाती है, कर्म की इच्छा नहीं होती। उसकी बुद्धि कुम्भकर्ण जैसी हो जाती है जिसने तपस्या का फल छह माह की नींद मांगी। नीद को ही वह जीवन की सर्वोत्तम निधि मानता है। इसी में आनन्द अनुभव करता है।

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ।9।

हे अर्जुन, सतोगुण जीव में सुख का भाव उत्पन्न करता है। रजोगुण भी कामना और आसक्ति के माध्यम से सुख प्रदान करते हुए उसे अधिक-अधिक कर्म में लगाता है और तमोगुण उसके ज्ञान को ढक कर प्रमाद में लगाता है, उसे अज्ञान में सुख मिलता है। परन्तु यह सभी मिथ्या सुख क्रमशः अहंकार वश, आसक्ति वश और अज्ञान वश उत्पन्न होते हैं।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ।10।

हे अर्जुन, यदि रज और तम को दबा दिया जाय तो सतोगुण बढ़ता है। सतोगुण और तमोगुण को दबा कर रजोगुण बढ़ता है तथा सत्त्व और रज को दबाकर तमोगुण बढ़ता है।

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ।11।

हे अर्जुन, सभी जीवों में तीनों गुण भिन्न भिन्न मात्रा में होते हैं। कर्म प्रारब्ध और परिस्थिति वश गुणों की मात्रा में अन्तर भी आता है। जब देह में समस्त इन्द्रियों और मन में ज्ञान और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है तो सतोगुण बड़ा होता है।


लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ।12।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ।13।

जब रजोगुण बढ़ा होता है तो उस समय लोभ और सकाम कर्म करने की इच्छा उत्पन्न होती है और जीव कर्म में लग जाता है। फिर इच्छा पूरी हुयी तो उसकी पूर्ति के लिए अधिक से अधिक कर्म और विषय भोग की लालसा भी उत्पन्न होती है और इच्छा पूरी नहीं हुयी या भोग प्राप्त नही हुए तो अशान्ति उत्पन्न होती है। तमोगुण के बढ़ने पर मन, बुद्धि में अज्ञान छा जाता है, कर्म करने की भी इच्छा नहीं होती। प्रमाद, आलस्य, निद्रा यह सब उत्पन्न होते हैं।

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌ ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ।14।
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्‍गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ।15।

हे अर्जुन जब मनुष्य सत्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात जब देह त्यागता हैं तो ज्ञान में देह बुद्धि होने के कारण, श्रेष्ठ आचरण करने वाले विद्यावान और योगियों के घर में जन्म लेता है। योग भ्रष्ट पुरुष का जन्म इसी कारण होता है। रजोगुण की वृद्धि होने पर मति किसी खास कर्म अथवा उसके फल भोग आदि में होती है अतः मृत्यु के बाद वह आसक्ति वाले रजोगुणी परिवार में जन्म लेता है और तमोगुण के बढ़ने पर जब मृत्यु होती है तो घोर तमस (अज्ञान) के कारण मति मूढ़ हो जाती है अतः अगला जन्म मूढ़ योनियों में होता है।

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌ ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌ ।16।

सतोगुण से ‘सुकृत’ (श्रेष्ठ आचरण) का जन्म होता है परिणामतः ज्ञान और निर्मल फल की प्राप्ति होती है। रजोगुण से उत्पन्न कर्म का अन्तिम परिणाम अशान्ति और दुःख है और तमोगुण मूढ़ता को जन्म देता है।

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ।17।

सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है (विशुद्ध आत्मतत्व सतोगुण के पाश में बंधा जीवात्मा अहंकार युक्त रहता है) रजोगुण लोभ को जन्म देता है और तमोगुण से प्रमाद, मोह और मूढ़ता उत्पन्न होते हैं ।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ।18।

सत्वगुण में स्थित पुरुष ऊर्ध्व गति को प्राप्त होते हैं अर्थात योगभ्रष्ट और विद्या विनय सम्पन्न घरों में जन्म लेता है। रजोगुण में स्थित पुरुष मध्य गति को प्राप्त होते हैं अर्थात सकामी, लोभी, सांसारिक लोगों के घर में जन्म लेते हैं और तमोगुणी पुरुष नीच गति को प्राप्त होते हैं अर्थात मूढ़ योनियों में जन्म लेते हैं।

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ।19।

जिस समय मनुष्य दृष्टा भाव से स्थित रहता है और सत्त्व, रज, तम इन तीन गुणों को कर्ता देखता है, उस समय साक्षी भाव से कर्मों के कर्तापन से निर्लिप्त अर्थात अहंकार से मुक्त होकर परम स्थिति को तत्व से जानता है।

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्‌ ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ।20।

उस समय इस शरीर की उत्पत्ति के कारण इन तीनों गुणों का; साक्षी भाव से स्थित पुरुष, तत्व को जानते हुए उल्लंघन कर जाता है और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था सब उसके लिए खेल हो जाते हैं। देह उसके लिए सांप की केंचुली के समान हो जाता है। अतः देह भाव से निर्लिप्त वह मेरे स्वरूप (आत्मा) को प्राप्त होता है।

अर्जुन उवाच

कैर्लिङ्‍गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ।21।

अर्जुन बोले, हे भगवन ऐसा साक्षी भाव से तत्व में स्थित मुक्त पुरुष किन किन लक्षणों से युक्त होता है और उसका आचार विचार किस प्रकार का होता है और किन उपायों से वह तीन गुणों से मुक्त हो जाता है।

श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्‍क्षति ।22।

हे अर्जुन, आत्म स्वरूप में स्थित, सदा साक्षी भाव से देखता हुआ सतोगुण रूपी ज्ञान और उसके अहंकार, रजोगुण की कार्य प्रवृत्ति और तमोगुण के भ्रम व मूढ़ता भाव यदि आते हैं तो उनमें यदि प्रवृत्त होता है तो बिना किसी आसक्ति और द्वेष के और यदि उन त्रिगुण भावों से अलग होता है तो उनकी कोई कामना नहीं करता क्योंकि उसे कर्म का अथवा अपने गुणों का कोई अभिमान नहीं होता, वह समुद्र के जल की तरह स्थित रहता है।

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्‍गते ।23।

वह उदासीनवत् अर्थात सुख-दुःख, हानि-लाभ में समान रहता हुआ किसी भी गुण से विचलित नहीं किया जाता है क्योंकि वह जानता है कि प्रकृति के गुण ही, गुण और कर्म का कारण हैं, वह यह जानकर गुणों के खेल को देखता रहता है। जिस प्रकार आकाश, वायु से प्रभावित नहीं होता उसी प्रकार वह आत्मरत पुरुष गुणों से प्रभावित नहीं होता और सदा आत्म स्थित रहता है और इस परम स्थिति से कभी भी विचलित नहीं होता।

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।24।

हे अर्जुन, मुझमें स्थित पुरुष सम्पूर्ण जगत को ब्रह्ममय देखता है इसलिए वह सुख और दुःख को समान समझता है। उसके लिए मिट्टी पत्थर सब एक समान हो जाते है, प्रिय अप्रिय कोई नहीं रहता। सदा समभाव में स्थित रहता है। कोई उसकी निन्दा करे अथवा स्तुति उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उसकी बुद्धि सदा आत्म स्थित रहती है।

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते ।25।

कोई उस व्यक्ति का अपमान करे, अपशब्द कहे अथवा उसकी महात्मा, ज्ञानी, ईश्वर समझकर पूजा करे, वह दोनों स्थितियों में सम रहता है। मित्र और वैरी उसके लिए समान हैं, दोनों में वह आत्म स्वरूप को देखता है शरीर में स्थित गुणों के कार्यों को देखकर मुस्कुराता है। उसकी अहं बुद्धि समाप्त हो जाती है अतः कर्तापन के भाव से रहित है। सदा साक्षी भाव से स्थित रहता हुआ तीनों गुणों का उल्लंघन कर जाता है।

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ।26।

जो न भटकने वाली बुद्धि से मुझमें एकत्व रखता है, सदा मुझ आत्मतत्व में रत रहता है, स्वरूप, अनुभूति में निमग्न रहता है, वह तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है। वह भुना हुआ बीज हो जाता है जिससे अंकुर नहीं फूटता है। इसी प्रकार उसके अन्दर अहं और आसक्ति का भाव कभी नहीं आता है। इस प्रकार परमात्मा से एकत्व रखने वाला पुरुष उसी परमतत्व, परमगति को प्राप्त होता है।


ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ।27।

हे अर्जुन, जिसे ब्रह्म कहा गया है वह ब्रह्म ही यह आत्मा (मैं हूँ) है। मैं आत्मा अमृत हूँ अर्थात परम विशुद्ध ज्ञान हूँ जिसका कभी नाश नहीं होता। मैं ही स्वभाव (धर्म) का आश्रय हूँ। मुझे प्राप्त कर योगी परम आनन्द परम शान्ति को प्राप्त होता है। उस परम शान्ति और आश्रय का घर मैं आत्मा ही हूँ। यही अन्तिम स्थिति है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नामचतुर्दशोऽध्यायः14
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