Monday, September 12, 2011

गीता - आत्मगीता - अध्याय ४ -ज्ञानकर्मसंन्यास योग (हिन्दी भाष्य ) / भाष्यकार प्रो बसन्त प्रभात जोशी


ईश्वर ने जीवों के कर्म के अनुसार सृष्टि की रचना करने का जो संकल्प किया उसका नाम कर्म है। कर्महीनता अकर्म है और निषिद्ध कर्म ही विकर्म है। स्वभाव के विपरीत कर्म भी, विकर्म ही हैं। कर्म की गति अत्याधिक सूक्ष्म है।


                                आत्म गीता - भाष्यकार  -  प्रो. बसन्त प्रभात जोशी


                                         चतुर्थोऽध्यायः ज्ञानकर्मसंन्यास योग


श्री भगवानुवाच

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ।1।

श्री भगवान अर्जुन को तत्त्व ज्ञान समझाते हुए कहते हैं:-
मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था। सूर्य ज्ञान का प्रतीक है। श्री भगवान ने यहाँ बताया है कि पृथ्वी की उत्पत्ति से पहले भी मैंने इस योग को अनेक ज्ञानियों को दिया था। ऋषि कश्यप और माता अदिति के बारह पुत्रों में एक श्री विष्णु और दूसरे सूर्य माने जाते हैं। विष्णु जी द्वारा अपने भाई सूर्य आदि को दिया ज्ञान का सन्दर्भ भी श्री कृष्ण द्वारा यहाँ दिया जा रहा है। उन ज्ञानियों ने इसे वैवस्वत मनु को दिया और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।2।

इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, यह योग बहुत समय से इस पृथ्वी से लुप्त हो गया था।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌ ।3।

तुझे अपना प्रिय सखा व भक्त जान कर ही मैंने यह पुरातन योग का वर्णन किया है। यह योग परम गोपनीय तथा अत्यन्त उत्तम है अर्थात केवल तत्व के जिज्ञासु के लिए ही यह जानने योग्य है तथा निश्चय ही कल्याणकारी होने से उत्तम है।

अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ।4।

अर्जुन बोला:- अपका जन्म तो अभी हाल का है तथा सूर्य का जन्म बहुत प्राचीन है। इस बात का मैं कैसे विश्वास करूं कि आप ने ही आदिकाल में सूर्य से यह योग कहा था।

श्रीभगवानुवाच

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ।5।

श्री भगवान बोले:- हे अर्जुन, तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं, उन सबको मैं जानता हूँ परन्तु तू उनको नहीं जानता है।

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌ ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ।6।

यद्यपि मैं अजन्मा और नाश रहित हूँ तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर हूँ फिर भी अपनी प्रकृति को अपने आधीन करके अपनी योग माया से प्रकट होता हूँ अर्थात अजन्मा व निराकार होने पर भी जगत के उपकार के लिए लीला हेतु अपनी योग शक्ति से माया द्वारा रचित साकार शरीर बना लेता हूँ। माया हमेशा ईश्वर के आधीन है जबकि जीव, माया (प्रकृति) के आधीन है क्योंकि जीव अपना स्वरूप भूला रहता है। नित्य शुद्ध आत्मरत पुरुष जो पूर्ण ज्ञान में स्थित है को प्रकृति भ्रम में नहीं डाल पाती अतः उसका जन्म व कार्य स्वयं की इच्छा पर निर्भर करते हैं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ।7।

जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तब मैं तब अपने स्वरूप को रचकर अवतार लेता हूँ। धर्म का अर्थ है आत्मा का स्वभाव। आत्मा का स्वभाव है ज्ञान। जहां ज्ञान है वहां आनन्द है, वहाँ शान्ति है, वहीं कल्याण है। इसके विपरीत जहाँ अधर्म है वहाँ अज्ञान है, मूढ़ता है, क्लेश है, अशान्ति है अर्थात जब जब घोर अशान्ति, क्लेश, मूढ़ता का बोलबाला बढ़ जाता है तब तब पुनः आत्मा के स्वभाव को स्थापित करने अर्थात शान्ति, आनन्द, ज्ञान की स्थापना के लिए मैं जन्म लेता हूँ। इसको तू इस प्रकार भी जान, अत्याधिक रजोगुण व तमोगुण की जब वृद्धि हो जाती है तो ज्ञान लुप्त हो जाता है। दम्भ, दर्प, पाखंड, अनाचार, व्याभिचार उपस्थित हो जाते हैं अतः सत्त्व, रज, तम गुणों को पुनः समरूप में स्थापित करने के लिए, मैं अवतार लेता हूँ।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।8।

सज्जन पुरुषों की रक्षा के लिए तथा घोर अधर्म रत पाप बुद्धि जिनका तमोगुण मिश्रित रजोगुण अत्याधिक बढा हुआ है के विनाश के लिए और पुनः धर्म की स्थापना के लिए (अर्थात तीनों गुण स्वाभाविक रूप से संसार के व्यवहार में स्थापित हो जायें तथा सतोगुणी बुद्धि पुनः प्रभावशाली हो जाय) जन्म लेता हूँ।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।9।

मेरे जन्म व कर्म दिव्य और अलौकिक हैं अर्थात अजन्मा होकर भी में जन्म लेता हूँ, अक्रिय होकर भी कर्म करता हूँ। जो मनुष्य मेरे जन्म व कर्म के रहस्य को जानते हैं वह शरीर त्याग कर पुनः जन्म और मृत्यु को प्राप्त नहीं होते बल्कि मुझ (आत्म स्थिति) को प्राप्त होते हैं।
वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ।10।

जिनका राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गया है, जिनका मन मुझमें लगा है, वे मेरे भक्त जो मुझमें ही आश्रित हैं, ज्ञान तप से पवित्र होकर आत्म स्वरूप अर्थात मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं। उनमें मुझमें कुछ भी भिन्नता नहीं रहती

ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌ ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।11।

जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार अर्थात जिस भावना से भजते हैं मैं उसी भावना से उनको फल देता हूँ। सभी मनुष्य सभी प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। नाना देवी देवताओं की उपासना भिन्न भिन्न धर्म सम्प्रदायों का अनुसरण मेरा ही भजन है। ज्ञान के अभावमें बुद्धि भेद करती है।

काङ्‍क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ।12।

इस संसार में कर्म फल को चाहने वाले मनुष्य देवताओं का पूजन करते हैं। जिसकी जो इच्छा होती है वह देव पूजन से पूर्ण हो जाती है, पर वह पूर्ण हुयी इच्छा उनके कर्म फल के स्वरूप ही होती है। कर्म के सिवाय देने वाला अन्य कोई नहीं है। जैसा कर्म वैसा फल अर्थात संसार में कर्म से ही फल प्राप्ति होती है, जैसा बीज होगा या जिस प्रकृति का बीज होगा वैसी फसल होगी। इसी प्रकार जिस मनुष्य की पूजन सम्बन्धी जैसी भावना होती है, वैसा फल उसे मिलता है।

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्‌ ।13।

इसी बात के आधार पर गुण कर्म के विभागानुसार चार वर्णों को मैंने (मेरी परा प्रकृति ने) उत्पन्न किया है। मनुष्य के द्वारा होने वाले कार्य चार प्रकार के होते हैं।
1 –सत्त्व की प्रधानता, रज, तम गौण - ब्राह्मण
2 - रज की प्रधानता, सत्त्व मध्यम और तम अल्प - क्षत्रिय
3 - रजोगुण मध्यम, तम मध्यम, सत्त्व अल्प – वैश्य
4 - तम की प्रधानता, रज मध्यम, सत्त्व अल्प – शूद्र
जिनमें सत्त्व की प्रधानता होती है जिन्हें ब्राह्मण कहा गया है, वह ज्ञान की ओर लालायित रहते हैं । ईश्वर भक्त, सरल होते हैं । रज की प्रधानता, सत्त्व मध्यम और तम अल्प क्षत्रियों की विशेषता है यह वीर सैनानी प्रजापालक, समाज की रक्षा करने वाले होते हैं। इन्हें क्षत्रिय कहा है। रजोगुण मध्यम, तम मध्यम, सत्त्व अल्प कृषि, पशुपालन, व्यापार करने वाले हैं। यह धन के प्रति लालायित रहते हैं, इन्हें वैश्य कहा है। स्वार्थ व लालच की प्रधानता होती है। तम की प्रधानता, रज मध्यम, सत्त्व अल्प, मोटी बुद्धि के सेवा करने वाले मजदूर आदि होते हैं, इन्हें शूद्र कहा है। प्रत्येक समाज में कार्य भेद के अनुसार चार वर्ण अवश्य मिलते हैं। यह सत्त्व, रज, तम के प्रभाव के कारण होते हैं और सत्त्व, रज, तम का मिश्रण ही इनके अलग अलग परिस्थिति और परिवारों में जन्म लेने का कारण है। वास्तव में सब एक होते हुए भी कर्म फल के अनुसार स्वभाव वश भिन्न भिन्न वर्णों में उत्पन्न होते हैं। इन सबका कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी को अकर्ता जान क्योंकि प्रकृति के कारण ही यह रचना हुयी है।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ।14।

यह वर्ण भेद यद्यपि मेरी सत्ता द्वारा हुआ है, परन्तु मेरे (आत्मा) द्वारा नहीं किया गया है क्योंकि कर्मो में मेरी स्पृहा नहीं है इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते हैं। इस प्रकार जो आत्मतत्व (मुझे) को जान लेता है वह कर्मो में नहीं बंधता है।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌ ।15।

पूर्व काल में मुमुक्ष जनों ने भी इस प्रकार जान कर कर्म किये हैं। अपने को दृष्टा मान सभी कर्म सकाम पुरुषों की तरह उन मुमुक्ष जनों द्वारा किये गये। अतः हे अर्जुन, तू भी पूर्वजों की भांति सदा किये जाने वाले कर्मो को कर।

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌ ।16।

कर्म क्या है, अकर्म क्या है? इसका निर्णय करने में बड़े बड़े बु़द्धिमान पुरुष भी भ्रम में पड़ जाते हैं फिर साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है। अतः मैं तुझे कर्म तत्व को भलीभांति बताता हूँ जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात कर्म बन्धन से मुक्त हो जायेगा।

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ।17।

श्री भगवान कहते हैं कर्म को जानना चाहिये अकर्म को जानना चाहिये और विकर्म को जानना चाहिये। कर्म क्या है? ईश्वर ने जीवों के कर्म के अनुसार सृष्टि की रचना करने का जो संकल्प किया उसका नाम कर्म है। कर्महीनता अकर्म है और निषिद्ध कर्म ही विकर्म है। स्वभाव के विपरीत कर्म भी, विकर्म ही हैं। इसको अच्छी प्रकार जान लेना चाहिए क्योंकि कर्म की गति अत्याधिक सूक्ष्म है और उसे समझना बहुत कठिन है।

कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्‌ ।18।

जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है, अकर्म में कर्म देखता है अर्थात समस्त कर्म करता हुआ साक्षी भाव से तटस्थ रहता है, कर्म तथा उनके फलों में आसक्त नहीं होता है, त्यागते हुए भोगता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और समस्त कर्मों को करने वाला अकर्ता पुरुष है।

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ।19।

जिसके सम्पूर्ण कर्म बिना किसी कामना और संकल्प के होते हैं, जिस प्रकार अग्नि में सब कुछ भस्म हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञान अग्नि में जिसके कर्म भस्म हो गये हैं ऐसा मनुष्य वास्तव में ब्रह्मज्ञानी है।

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः  ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ।20।

जिसने कर्म फल में आसक्ति का त्याग कर दिया है तथा जो शरीर के प्रति उदासीन हो गया है, जो नित्य तृप्त है अर्थात आत्मा में संतुष्ट है, वह सभी कर्मों को करता हुआ वास्तव में कुछ नहीं करता है।

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌ ।21।

जिसने आशा को छोड़ दिया है, जिसका चित्त निरन्तर आत्मा में स्थित हैं जिसने समस्त भोग सामग्री का परित्याग कर दिया है,केवल शरीर सम्बन्धी कर्म करता है अर्थात शरीर से कार्य करताहुए भी सदैव आत्म रूप में स्थित रहता है, वह पाप को प्राप्त नहीं होता अर्थात कर्म बन्धन में नहीं फंसता है।

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ।22।

जो पुरुष बिना इच्छा के जो मिल जाय, उसमें संतुष्ट रहता है, जिसमें दूसरे के प्रति ईर्ष्या का भाव समाप्त हो गया है, जो सुख दुख में, हर्ष व शोक से रहित होकर उदासीन हो गया है, सिद्धि और असिद्धि में समान रहने वाला अर्थात काम सफल हो तो ठीक असफलता मिले तो ठीक, इस प्रकार सम रहते हुए कर्म करता हुआ कर्म में नहीं बंधता है।

गतसङ्‍गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ।23।

जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है अर्थात गुण युक्त होने पर भी जो निर्गुण हो गया है, जो सदैव मुक्त है, जिसका चित्त सदैव आत्म ज्ञान में स्थित है, केवल स्वाभाविक कर्म करता है; के समस्त कर्म स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं अर्थात वह कर्म बन्धन से मुक्त हो जाता है।

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्‌ ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ।24।

अर्पण ही ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, अग्नि ब्रह्म है, आहुति ब्रह्म है, कर्म रूपी समाधि भी ब्रह्म है और जिसे प्राप्त किया जाना है वह भी ब्रह्म ही है। यज्ञ परब्रह्म स्वरूप माना गया है। इस सृष्टि से हमें जो भी प्राप्त है, जिसे अर्पण किया जा रहा है, जिसके द्वारा हो रहा है, वह सब ब्रह्म स्वरूप है अर्थात सृष्टि का कण कण, प्रत्येक क्रिया में जो ब्रह्म भाव रखता है वह ब्रह्म को ही पाता है अर्थात ब्रह्म स्वरूप हो जाता है ।

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ।25।

कर्म योगी देव यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं तथा अन्य ज्ञान योगी ब्रह्म अग्नि में यज्ञ द्वारा यज्ञ का हवन करते हैं। देव पूजन उसे कहते हैं जिसमें योग द्वारा अधिदैव को जानने का प्रयास किया जाता है। कई योगी ब्रह्म अग्नि में आत्मा को आत्मा में हवन करते हैं अर्थात अधियज्ञ का पूजन करते हैं।

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ।26।

कई योगी इन्द्रियों के विषयों को रोककर अर्थात इन्द्रियों को संयमित कर हवन करते हैं, अन्य योगी शब्दादि विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नि में हवन करते है अर्थात इन्द्रिय विषयों को रोककर हवन करते है।

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ।27।

अन्य कई योगी सभी इन्द्रियों की क्रियाओं एवं प्राण क्रियाओं को एक करते हैं। इन सभी वृत्तियों को करने से ज्ञान प्रकट होता है ज्ञान के द्वारा आत्म संयम योगाग्नि प्रज्वलित कर सम्पूर्ण विषयों की आहुति देते हुए आत्म यज्ञ करते हैं।

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ।28।

इस प्रकार भिन्न भिन्न योगी द्रव्य यज्ञ तप यज्ञ तथा दूसरे योग यज्ञ करने वाले है और कई तीक्ष्णव्रती होकर योग करते हैं यह स्वाध्याय यज्ञ करने वाले पुरुष शब्द में शब्द का हवन करते है। इस प्रकार यह सभी कुशल और यत्नशील योगाभ्यासी पुरुष जीव बुद्धि का आत्म स्वरूप में हवन करते हैं।
द्रव्य यज्ञ- इस सृष्टि से जो कुछ भी हमें प्राप्त है उसे ईश्वर को अर्पित कर्र ग्रहण करना.
तप यज्ञ- जप कहाँ से हो रहा है इसे देखना तप यज्ञ है.
योग यज्ञ- प्रत्येक कर्म को ईश्वर के लिया कर्म समझ निपुणता से करना योग यज्ञ है.
तीक्ष्ण वृती- यम नियम संयम आदि कठोर शारीरिक और मानसिक क्रियाओं द्वारा मन को निग्रह करने का प्रयास. शम, दम, उपरति, तितीक्षा, समाधान, श्रद्धा.
मन को संसार से रोकना शम है.
बाह्य इन्द्रियों को रोकना दम है.          
निवृत्त की गयी इन्द्रियों भटकने न देना उपरति है.
सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, हानि-लाभ, मान अपमान को शरीर धर्म मानकरसरलता से सह लेना तितीक्षा है.
रोके हुए मन को आत्म चिन्तन में लगाना समाधान है.

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ।29।

कई योगी अपान वायु में प्राण वायु का हवन करते हैं तथा कई प्राण वायु में अपान वायु का हवन करते हैं । कई दोनों प्रकार की वायु, प्राण और अपान को रोककर प्राणों को प्राण में हवन करते हैं।

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।

सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ।30।

कई सब प्रकार के आहार को जीतकर अर्थात नियमित आहार करने वाले प्राण वायु मेंप्राण वायु का हवन करते हैं। इस प्रकार यज्ञों द्वारा काम क्रोध एवं अज्ञान रूपी पाप का नाश करने वाले सभी; यज्ञ को जानने वाले हैं अर्थात ज्ञान से परमात्मा को जान लेते हैं।

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्‌ ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ।31।

यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले पर ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं अर्थात यज्ञ क्रिया के परिणाम स्वरूप जो बचता है वह ज्ञान ब्रह्म स्वरूप है। इस ज्ञान रूपी अमृत को पीकर वह योगी तृप्त और आत्म स्थित हो जाते हैं परन्तु जो यज्ञाचरण नहीं करते उनको न इस लोक में कुछ हाथ लगता है न परलोक में।

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ।32।

इस प्रकार बहुत प्रकार की यज्ञ विधियां वेद में कही हैं। तू यह जान ले कि यह यज्ञ विधियां कर्म से ही उत्पन्न होती हैं। इस बात को जानकर कर्म की बाधा से तू मुक्त हो जायेगा।

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ।33।

हे अर्जुन, द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है। द्रव्यमय यज्ञ सकाम यज्ञ हैं और अधिक से अधिक स्वर्ग को देने वाले हैं परन्तु ज्ञान यज्ञ द्वारा योगी कर्म बन्धन से छुटकारा पा जाता है और परम गति को प्राप्त होता है। प्रिय अर्जुन तू यह जान ले कि सभी कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं। ज्ञान से ही आत्म तृप्ति होती है और कोई कर्म अवशेष नहीं रहता।

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ।34।

हे अर्जुन, उस परम ज्ञान को जानने के लिए तुझे ब्रह्मनिष्ठ संतो के पास जाना होगा, उनकी सेवा करनी होगी उन्हें श्रद्धा विनयसे प्रणाम कर प्रसन्न करना होगा। वह सरलता पूर्वक प्रश्न करने पर परम ज्ञान को जानने वाले महात्मा तुझे उस तत्व ज्ञान जिसे ब्रह्म ज्ञान या आत्म ज्ञान कहते हैं, का उपदेश देंगे।

यज्ज्ञात्वान पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भुतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ।35।

उन सतपुरुषों से ज्ञान को जानकर तू इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगा और तू निसंशय होकर पहले अपने में शुद्ध आत्म रूप को फिर सम्पूर्ण भूतों में शुद्ध आत्म स्वरूप को देखेगा।

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ।36।

यदि तू पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी इस ज्ञान के प्रभाव से सम्पूर्ण पाप समुद्र से उसी प्रकार पार हो जायेगा जैसे नौका समुद्र को पार कर जाती है।

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ।37।

तू इसे इस प्रकार भी जान ले कि जैसे प्रज्वलित अग्नि सभी काष्ठ को भस्म कर देती है उसी प्रकार ज्ञानाग्नि सभी कर्म फलों को; उनकी आसक्ति को भस्म कर देती है।

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ।38।

हे अर्जुन, तू निश्चयपूर्वक जान ले कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला वास्तव में कुछ भी नहीं है क्योंकि जल, अग्नि आदि से यदि किसी मनुष्य अथवा वस्तु को पवित्र किया जाय तो वह शुद्धता और पवित्रता थोड़े समय के लिए ही होती है, जबकि ज्ञान से जो मनुष्य पवित्र हो जाय वह पवित्रता सदैव के लिए हो जाती है। ज्ञान ही अमृत है और इस ज्ञान को लम्बे समय तक योगाभ्यासी पुरुष अपने आप अपनी आत्मा में प्राप्त करता है क्योंकि आत्मा ही अक्षय ज्ञान का श्रोत है।

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ।39।

जिसने अपनी इन्द्रियों का वश में कर लिया है तथा निरन्तर उन्हें वशमें रखता है, जो निरन्तर आत्म ज्ञान में तथा उसके उपायों में श्रद्धा रखता है, जो ज्ञान के लिए लालायित रहता है, उसकी खोज करता है, इसी जिज्ञासा के साथ शास्त्र को टटोलता है, गुरु, संत से जिज्ञासा करता है और निरंतर मनन चिंतन करता है उसके अन्दर ज्ञान स्वतः ही आते जाता है और ज्ञान की लालसा बड़ने के साथ ज्ञान का अवतरण स्वाभाविक रूप से होता जाता है । ऐसा मनुष्य उस अक्षय ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होते ही परम शान्ति को प्राप्त होता है। ज्ञान प्राप्त होने के बाद उसका मन नहीं भटकता, इन्द्रियों के विषय उसे आकर्षित नहीं करते, लोभ मोह से वह दूर हो जाता है तथा निरन्तर ज्ञान की पूर्णता में रमता हुआ आनन्द को प्राप्त होता है।

अज्ञश्चश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ।40।

जो मनुष्य ज्ञान हीन है और जिस मनुष्य को ज्ञान के प्रति श्रद्धा नहीं है, न ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा रखता है, संशयग्रस्त ऐसा मनुष्य परमार्थ से भ्रष्ट हो जाता है। जिस मनुष्य में ज्ञान नहीं, अज्ञानरूपी अन्धकार ने जिसे जकड़ लिया है, जो संशय मन वाला है उसे न इस संसार में सुख मिलता है न परलोक में सुख मिलता है।

योगसन्नयस्तकर्माणं ज्ञानसञ्न्निसंशयम्‌ ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।41।

हे अर्जुन जिसने योग और सन्यास से सभी कर्म बन्धन से छुटकारा पा लिया है, जिसके सभी कर्म ईश्वर के निमित्त  हैं, जिसने ज्ञान रूपी तलवार से समस्त संशयों का काट डाला है, जिसका अन्तःकरण उसके वश में है उसे कर्म बन्धन नहीं बांधते हैं।

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ।42।

अतः हे अर्जुन, तू मन में रहने वाले इस अज्ञान से उत्पन्न संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काट कर समभाव से कर्म करता हुआ आत्म स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो।
       

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यास योगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥4॥
             
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