ૐ श्रीआत्मने नमः
आत्मगीता - भाष्यकार प्रो बसन्त प्रभात जोशी
अथ प्रथमोध्यायः-विषाद योग
श्रीमद्भगवद्गीता की पृष्ठभूमि महाभारत का युद्घ है। जिस प्रकार विशिष्ट मनुष्य भी अपने जीवन समस्याओं में उलझकर विषाद को प्राप्त होकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उस दिमागी नपुंसकता के कारण जीवन युद्ध से पलायन करने का मन बना लेता है जैसे अर्जुन जो कि महाभारत युद्ध का महानायक है स्वजनों से मोह के कारण स्वाभाविक कर्मक्षेत्र से निराश हो जाता है। अर्जुन की तरह ही हम सभी क्लैव्यता के कारण हताश हो जाते हैं और स्वाभाविक कर्म से विमुख हो जाते हैं। अर्जुन भाग्यवान था उसे विषाद से योग की प्राप्त हुई परन्तु सबको इस प्रकार का अवसर नहीं मिलता। केवल समर्थ गुरु अथवा भगवद्गीता का उपदेश जो उपनिषदों का सार है, इस दिमागी नपुंसकता को दूर कर सकता है।
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चेव किमकुर्वत संजय।1।
पुत्र मोह से व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं - हे संजय, कुरूक्षेत्र में युद्ध की आशा से एकत्र भिन्न भिन्न जीव स्वभाव को धारण किए शूरवीर जिनकी प्रकृति एक दूसरे से नितांत अलग है मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?
यहाँ धर्म शब्द महत्वपूर्ण है। धर्म का अर्थ है धारण करने वाला अथवा जिसे धारण किया गया है। धारण करने वाले को आत्मा कहा जाता है और जिसे धारण किया गया है वह प्रकृति है। अतः सुस्पष्ट है इस श्लोक में धर्म शब्द का अर्थ जीव स्वभाव है जिसे प्रकृति भी कहते हैं और क्षेत्र शब्द का अर्थ शरीर है। भगवद्गीता के अन्य प्रसंगों में भी इसी बात की पुष्टि होती है. यथा ‘स्वधर्मे निधनम् श्रेयः पर धर्मः परधर्मः भयावहः’, अपने स्वभाव में स्थित रहना, उसमें मरना ही कल्याण कारक माना है। यह धर्म शब्द गीता शास्त्र में अत्याधिक महत्वपूर्ण है। श्री भगवान ने सामान्य मनुष्य के लिए स्वधर्म पालन; स्वभाव के आधार पर जीवन जीना परम श्रेयस्कर बताया है।
महर्षि व्यास ब्रह्मज्ञानी थे। उनकी दृष्टि से धर्म का अर्थ है आत्मा और क्षेत्र का अर्थ है शरीर। इस दृष्टिकोण से पुत्र मोह से व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं, हे संजय, कुरूक्षेत्र में जहाँ साक्षात धर्म, शरीर रूप में भगवान श्री कृष्ण के रूप में उपस्थित है वहाँ युद्ध की इच्छा लिए मेरे और पाण्डु पुत्रों ने क्या किया?
गीता की समाप्ति पर इस उपदेश को स्वयं श्री भगवान ने धर्म संवाद कहा। धर्म, जिसने धारण किया है, वह आत्मतत्व परमात्मा शरीर रूप में जहाँ उपस्थित है, यह भी ब्रह्मर्षि व्यास जी के चिन्तन में रहा होगा। अतः व्यास जी द्वारा यहाँ धर्म क्षेत्र शब्द का प्रयोग सृष्टि को धारण करने वाले परमात्मा श्री कृष्ण चन्द्र तथा धृतराष्ट के जीव भाव (जिसे धारण किया है) को संज्ञान में लेते हुए किया गया है। ‘धर्म संस्थापनार्थाय’, से भी इस बात की पुष्टि होती है। इस श्लोक में महर्षि व्यास ने धर्म शब्द ईश्वर एवं जीव दोनों स्वभावों के लिए प्रयोग कर और क्षेत्र शब्द जहाँ यह दोनों रहते हैं (शरीर) के लिए करते हुए सम्पूर्ण गीता का सार एक श्लोक में कह दिया है।
(नोट-कोई लड़ाई का मैदान धर्म भूमि नहीं हो सकता.)
दृष्ट्रा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्।2।
संजय बोले हे राजन, कुरूक्षेत्र के मैदान में दुर्योधन द्वारा
पाण्डवों की व्यूहाकार सेना को देखकर आचार्य द्रोण के पास जाकर यह वचन कहा।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढ़ां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता।3।
हे आचार्य, द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न जो आपका परम मेधावी शिष्य रहा है, जो पाण्डव सेना का नायक है, उसके द्वारा व्यूहाकार रूप से खड़ी की हुई पाण्डवों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।4।
धृष्टकेतुच्श्रेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरूजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः।5।
युधामन्यु विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः।6।
इस पाण्डवों की सेना में बड़े बड़े धनुर्धारी हैं और युद्ध में भीम और अर्जुन के समान परम बलशाली शूरवीर सात्यकी, राजविराट महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु, महारथी चेकितान, तथा बलवान राजा काशीराज, पुरुजित,कुन्तीभोज और मुनष्यों में श्रेष्ठ शैव्य,परम पराक्रमी युद्धामन्यु और बलशाली उत्तमौजा, महारानी सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु और पांचों पाण्डवों की पटरानी द्रौपदी के पांच पुत्र जो सभी महारथी हैं।
अस्माकं तु विशिष्टा ये
तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य
सञ्ज्ञार्थम् तान् ब्रवीमि ते।7।
हे आचार्य हमारी सेना में जो प्रधान योद्धा हैं और सेना नायक हैं, उन्हें मैं आपकी जानकारी के लिए आपको बताता हूँ।
भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिज्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च।8।
एक तो स्वयं आप ही हैं, दूसरे मृत्युंजयी हम सबके पितामह भीष्म हैं। उनके अलावा महावीर कर्ण, संग्राम विजयी कुल गुरु कृपाचार्य तथा उन्हीं के समान बलशाली आपका पुत्र अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा हैं।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यत्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः।9।
हे आचार्य युद्ध में निपुण और भी बहुत से शूरवीर जिन्होंने अपना जीवन मेरे लिए दांव में लगा दिया है, अनेक प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित होकर सबके सब यहाँ उपस्थित हैं।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं
भीष्माभिरक्षितम्।
प्रर्याप्तं त्विदमेतेषां
बलं भीमाभिरक्षितम्।10।
हे आचार्य युद्ध में निपुण और भी बहुत से शूरवीर जिन्होंने अपना जीवन मेरे लिए दांव में लगा दिया है, अनेक प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित होकर सबके सब यहाँ उपस्थित हैं।
अयनेषु च सर्वेषु
यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु
भवन्तः सर्व एव हि।11।
हमारी सेना जिसकी पितामह भीष्म द्वारा रक्षा की जा रही है सब प्रकार से पराक्रमी योद्धाओं के कारण अजेय है और भीम द्वारा रक्षित पाण्डवों की सेना जो मुठ्ठी भर है तथा जिसमें कुछ ही पराक्रमी योद्धा हैं, जीतने में सुगम है।
तस्य सज्जनयन् हर्ष
कुरूवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः
शंङ्खदध्मौ प्रतापवान्।12।
हे राजन रण भूमि कुरूक्षेत्र में कौरवों में वृद्ध पितामह भीष्म ने दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए सिंह के समान उच्च स्वर में अपना शंख नाद किया।
ततः शंङ्खाश्च भेर्यश्चपणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।13।
भीष्म पितामह के शंख नाद के पश्चात अनेक शंख, नगारे, ढोल, मृदंग, नरसिंघे आदि वाद्य एक साथ बजने लगे और उन सब वाद्यों का मिलाजुला शब्द बड़ा भयंकर था।
ततः श्र्वेतैर्हयैर्युक्ते
महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चेव
दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।14।
इसके पश्चात सफेद घोड़ों से जुते अत्यन्त बड़े और सुन्दर रथमें बैठे हुए श्री कृष्ण चन्द्र महाराज और शत्रुओं को आंतकित करने वाले अर्जुन ने अपने अपने अलौकिक शंख बजाये।
पाच्ञजन्यं हृषीकेशो
देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खौ
भीमकर्मा वृकोदरः।15।
श्री कृष्ण चन्द्र जी ने पाच्ञजन्य शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त, भयानक कर्म करने वाले विशालदेही परम बलशाली भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।16।
कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्त विजय नामक तथा नकुलऔर सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये।
काश्यश्र्च परमेष्वासः
शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।17।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च
सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्र्च महाबाहुः
शंखन्दध्मुः पृथक्पृथक्।18।
हे राजन्, श्रेष्ठ धनुष वाले काशी के राजा और महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट, अजेय सात्यकी, राजा द्रुपद, महारानी द्रौपदी के पांचों पुत्र और दीर्घ बाहु वाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु ने अलग अलग शंख बजाये।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां
ह्रदयानि व्यदारयत्।
नभश्र्च पृथिवीं चैव
तुमुलो व्यनुनादयन्।19।
उन शंखों के घोष का इतना भयानक शब्द हुआ कि उसने आकाश और पृथ्वी को गुंजाते हुए सभी कौरवों के हृदय को अपनी आवाज और संताप से विदीर्ण कर दिया।
अथ व्यस्थितान्दृष्ट्वा
धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्रसम्पाते
धनुरुद्यम्य पाण्डवः।20।
ह्रषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
अर्जुन उवाच
सेनयोरूभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।21।
हे राजन्, वानर की ध्वजा वाले अर्जुन ने मोर्चे में डटे हुए, सभी कौरवों को देखकर तथा शस्त्र चलाने के लिए तैयार सेनाओं को देखकर, धनुष उठाकर श्री कृष्ण चन्द्र महाराज से कहा कि हे भगवन, मेरे रथ को इन दोनों सेनाओं के बीच में कृपा कर खड़ा कीजिए।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे।22।
मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध की इच्छा लिये इन कुरु योद्धाओं को अच्छी प्रकार देखना चाहता हूँ कि इस संग्राम में मुझे किन किन के साथ युद्ध करना है।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।23।
दुर्बुद्धि दुर्योधन के जो हितैषी राजा लोग इस सेना में आकर यहां जमा हैं, उन युद्ध प्रिय राजाओं और सम्बन्धियों को मैं देखना चाहता हूँ।
संजय उवाच
एवमुक्तो ह्रषीकेशो
गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये
स्थापयित्वा रथोत्तमम्।24।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः
सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्
समवेतान् कुरूनिति।25।
संजय बोले हे भरत श्रेष्ठ राजन, अर्जुन के इस प्रकार कहने पर दोनों सेनाओं के बीच में, जिनमें भीष्म और द्रोणाचार्य प्रमुख हैं और अन्य राजाओं के सामने श्री कृष्ण चन्द्र ने अपने उत्तम रथ को खड़ा करके यह कहा कि युद्ध के लिए एकत्रित इन कौरवों को देख।
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थ पितृनथपितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।26
जब उन दोनों सेनाओं के बीच में अर्जुन ने चाचा, ताऊ पितामह, मामा, भाईयों पुत्रों, पौत्रों, मित्रों को देखा।
श्वशुरान् सुह्रदश्र्चैव
सेनयोररुभयोरपि।
तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः
सर्वान् बन्धूनवस्थितान्।27।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
साथ ही ससुर, सुहृद आदि को दोनों सेनाओं में स्थित अपने मोर्चे पर डटे हुए देखा। उन बन्धुओं को युद्ध के लिए तत्पर देखकर, शोक से परिपूर्ण कुन्तीपुत्र अर्जुन श्री भगवान से यह बोले।
अर्जुन उवाच
दृष्टेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।28।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते।29।
अर्जुन अपने युद्ध प्रिय बन्धुओं को युद्ध के लिए देखकर अत्यन्त करूणा से युक्त होकर श्री कृष्ण चन्द्र महाराज से इस प्रकार बोला। हे कृष्ण, हे गोविन्द, अपने बन्धुओं को देखकर मेरे हाथ पांव ढीले हो रहे हैं और घबराहट के मारे मुख सूखा जा रहा है और मेरे शरीर में रोमांच और कम्पन हो रहा है।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः।30।
मेरे हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और मेरी त्वचा अग्नि के समान ताप से जल रही है। मेरी बुद्धि, मेरा मन भ्रमित हो रहा है और मैं खड़े रहने में समर्थ नहीं हूँ।
निमित्तानि च पश्यामि
विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि
हत्वा स्वजनमाहवे।31।
हे केशव, मैं अपने लक्षणों को भी विपरीत देख रहा हूँ और युद्ध में अपने बन्धु बान्धवों को मारकर कल्याण भी नहीं देखता।
न काङक्षे विजयं कृष्ण
न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द
किं भोगैर्जीवितेन वा ।32।
हे श्री कृष्ण, मैं अपने बन्धुओं को मारकर न तो विजय चाहता हूँ न राज्य सुख चाहता हूँ। स्वजनों को मारकर इस राज्य का हम क्या करेंगे, क्या जीवन ही हमारा उद्देश्य होगा, क्या हम भोग, भोग पायेंगे?
येषामर्थे काङि्क्षतं नो
राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे
प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।33।
किसी भी मनुष्य को अपने परिवार बन्धु-बान्धवों के लिए राज्य सुख की इच्छा होती है। विडंबना है कि वही बन्धुगण अपना राज्य वैभव छोड़कर और प्राण की आशा त्यागकर युद्ध में खड़े हैं।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाश्वशुराःपौत्राःश्यालाःसम्बन्धिनस्तथा।34।
ये बन्धुगण हमारे गुरूजन हैं ताऊ, चाचा, लड़के, पितामह, मामा, ससुर, साले, पौत्र और सभी निकट के सम्बन्धी लोग हैं।
एतान्न हन्तुमिच्छामि
घ्रतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य
हेतोः किं नु महीकृते।35।
हे मधुसूदन, इन निकट के बन्धुओं को मैं तीन लोकों के राज्य के लिए भी नहीं मारना चाहूँगा फिर पृथ्वी की तो बात ही क्या है।
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिःस्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।36।
हे श्री कृष्ण इन कौरवों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी, इन्हें मारकर हमें केवल पाप ही लगेगा।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं
धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा
सुखिनः स्याम माधव।37।
हे भगवन, अपने बन्धुओं बान्धवों तथा अपने भाई कौरवों को मारने के लिए मैं समझता हूँ कि हम योग्य नहीं हैं, क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने कुटुम्ब को मारकर कैसे सुखी हो सकता है।
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्।38।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्धिर्जनार्दन।39।
यद्यपि इन कौरवों की बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है और भ्रष्ट बुद्धि के कारण कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्र द्रोह के पाप को यह लोग समझ नहीं पा रहे हैं परन्तु हे जगदीश्वर, क्या हम भी कुल के नाश से उत्पन्न होने वाले दोष के बारे में न सोचें? क्या इस पाप से हटने का विचार हमें नहीं करना चाहिए?
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्रमधर्मोऽभिभवत्यतु।40।
हे श्री कृष्ण, कुल के नाश होने से सनातन काल से चला आ रहा कुल धर्म नष्ट हो जाता है। सम्पूर्ण कुल में पाप ही पाप फैल जाता है और धर्म का लोप हो जाता है।
अधर्माभिभवात्कृष्ण
प्रदुष्यति कुलस्रियः।
स्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय
जायते वर्णसंङ्करः।41।
हे कृष्ण, अधर्म के बढ़जाने से कुल की स्त्रियाँ व्यभिचारिणी हो जाती हैं क्योंकि युद्ध में पुरुषों के मारे जाने के कारण कुछ नाम मात्र के पुरुष ही बचे रह जाते हैं। स्त्रियों के दूषित हो जाने पर कुल में वर्ण संकर पैदा हो जाते हैं।
संङ्करःनरकायैव
कुलघ्रानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां
लुप्तपिण्डोदकक्रियाः।42।
वर्ण संकर कुल को नष्ट करने वालों सहित समस्त कुल को नरक में ले जाते हैं क्योंकि उन जन्म लेने वाले बच्चों के कुल और पिता का कुछ पता नहीं होता है। इसलिए वह श्राद्ध तर्पण और पिंड देने के अधिकारी नहीं होते हैं और यदि वह श्राद्ध तर्पण और पिंड क्रिया करते हैं तो भी उसका लाभ मृत आत्माओं को नहीं मिलता जिससे पितर नीच गति को प्राप्त होते हैं।
दोषैरेतैः कुलघ्रानां
वर्णसंङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः
कुलधर्माश्चशाश्वताः।43।
कुल को नष्ट करने वाले मनुष्यों के वर्ण संकर दोष के कारण अनादि काल से चला आ रहा सनातन कुल धर्म नष्ट हो जाता और जाति धर्म भी नष्ट हो जाते हैं ।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्यणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम।44।
हे द्वारिका नाथ, हे जनार्दन, जिन मनुष्यों का कुल धर्म नष्ट हो जाता है उस कुल के पितर और स्वयं वह मृत्यु के पश्चात अनिश्चित काल तक नरक में रहते हैं, यह बात हम सुनते आये हैं।
अहो बत महत्पापं कर्तु व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः।45।
यह बहुत ही शोक और दुःख की बात है कि हम लोग महान पाप करने को तैयार हो गये हैं और राज्य एवं सुख के लोभ से वशीभूत होकर अपने बन्धु बान्धवों को मारने के लिए तैयार हो गये हैं।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्टा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्।46।
हे श्री कृष्ण, अतः मैं समझता हूँ कि युद्ध करना बेकार है और यदि मुझ शस्त्र रहित और युद्ध में सामना न करने वाले की कौरव हत्या कर दें तो भी मरना मेरे लिए परम कल्याण कारक होगा।
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सड़्ख्ये
रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं
शोकसंविग्नमानसः।47।
हे श्री कृष्ण, अतः मैं समझता हूँ कि युद्ध करना बेकार है और यदि मुझ शस्त्र रहित और युद्ध में सामना न करने वाले की कौरव हत्या कर दें तो भी मरना मेरे लिए परम कल्याण कारक होगा।
ૐ तत्सदिति श्रीमद्भगवतगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोअध्यायः।। 1।।
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