Sunday, September 18, 2011

गीता - आत्मगीता - अध्याय ११ - विश्वरूपदर्शनयोग (हिन्दी भाष्य ) / भाष्यकार प्रो बसन्त प्रभात जोशी



हे परमदेव, पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के, प्रिय पति जैसे अपनी प्रिया के अपराध को सहन कर लेता है और क्षमा कर देता है उसी प्रकार हे प्रभु, आप मेरे अपराधों को सहन करते हुए क्षमा कीजिए।
आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं अर्थात आत्म स्वभाव को स्थापित करने के लिए आप अपनी इच्छा से देह धारण करते हैं।      

                                                आत्मगीता -भाष्यकार प्रो. बसन्त
                                     

                                                एकादशोऽध्यायःविश्वरूपदर्शनयोग


अर्जुन उवाच

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्‌ ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ।1।

अर्जुन बोले हे भगवन् मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपके द्वारा अत्यन्त गोपनीय आत्म स्वभाव विषयक वचन कहा है उससे मेरा मति भ्रम, मेरी मूढ़ता नष्ट हो गयी है।

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्‌ ।2।

हे भगवन् आपने मुझे भूतों की उत्पत्ति प्रलय और स्थिति को विस्तार पूर्वक बताया और अविनाशी आत्मतत्व का ज्ञान दिया।

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।3।

हे परम परमेश्वर, आप जैसा अपने को योग ऐश्वर्य से युक्त कहते हैं आप निःसन्देह वैसे ही हैं। आप निज इच्छा से प्रकट हुए हैं, आप स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं। हे प्रभु, हे पुरुषोत्तम, आपके ऐश्वर्य स्वरूप को जो सम्पूर्ण ज्ञान, शक्ति, बल, तेज आदि से युक्त है, मैं देखना चाहता हूँ।

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्‌ ।4।

हे प्रभु यदि आप समझते हैं कि आपका विभूति ऐश्वर्य युक्त स्वरूप मेरे द्वारा देखा जाना शक्य है तो कृपा कर अपने उस आत्मस्वरूप का दर्शन मुझे कराइये।

श्रीभगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ।5।

श्री भगवान बोले हे पार्थ तू मेरे सैकड़ो, हजारों नाना प्रकार के नाना वर्ण नाना आकृति वाले दिव्य स्वरूपों को देख। तू भली भांति मेरे आत्मा के विस्तार को जिसने सम्पूर्ण चर अचर को व्याप्त किया हुआ है, जो सर्वत्र दिव्य रूप में स्थित है, को देख।

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ।6।

हे अर्जुन, सभी आदित्यों में मुझे (मेरे आत्म स्वरूप को) देख, आठ वसुओं में मुझको देख, एकादश रूद्रों में, दोनों अश्विन कुमारों में, उन्चास मरुतगणों में तथा बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्य मय रूपों में, मुझ आत्मतत्व को देख।


इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्‌ ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि ।7।

हे अर्जुन, सम्पूर्ण चराचर सहित जगत को मेरे शरीर में स्थित आत्मा में देख और तू जो कुछ भी चर अचर से सम्बन्धित किसी भी तत्व, किसी भी स्वरूप, किसी भी विभूति को देखना चाहता है, वह मेरे आत्म रूप में स्थित होकर देख।

न तु मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्‌ ।8।

हे अर्जुन, तू अपने इन प्रकृति जन्य नेत्रों से मुझे नहीं देख सकता अतः मैं तुझे दिव्य चक्षु प्रदान करता हूँ अर्थात मैं तेरे अन्दर व्याप्त आत्मतत्व को जाग्रत करता हूँ जिसके द्वारा ही तू मेरे आत्म स्वरूप की ईश्वरीय योग शक्ति को देख पायेगा।

संजय उवाच

एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्‌ ।9।

संजय बोले हे राजन्, समस्त पापों का नाश करने वाले महायोगेश्वर श्री कृष्ण चन्द्र जी ने यह कहकर अर्जुन को परम ऐश्वर्य युक्त आत्म स्वरूप के दर्शन कराये।

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्‌ ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्‌ ।10।
दिव्यमाल्याम्बरधरं  दिव्यगन्धानुलेपनम्‌ ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्‌ ।11।

संजय बोले हे राजन्, प्रभु का आत्म रूप अत्यन्त विलक्षण है। उनके आत्म स्वरूप के इस चराचर जगत में सभी ओर नेत्र हैं, सभी ओर मुख हैं। उनका यह स्वरूप अत्यन्त अद्भुत है। उनके भिन्न-भिन्न स्वरूपों ने भिन्न-भिन्न प्रकार के दिव्य आभूषण धारण किये हुए हैं, अनेक दिव्य शस्त्र अस्त्रों को हाथ में उठाये हुए हैं, अनेक प्रकार की दिव्य गन्ध भिन्न भिन्न शरीरों में लेप किये हुए हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर जगत में अत्यन्त अद्भुत एंव आश्चर्य युक्त जिसकी कोई सीमा नहीं है सब ओर भिन्न भिन्न शरीरों को श्री भगवान के आत्म स्वरूप में, अर्जुन ने देखा।

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ।12।

श्री भगवान का आत्म स्वरूप अत्यन्त अद्भुत है। वह अनन्त प्रकाशमय है, वह इतना प्रकाशमय है कि यदि हजारों सूर्य एक साथ उत्पन्न हो जायें तो वह उस परम परमात्मा के प्रकाश के समान शायद ही हो। यहाँ  संजय यह बताना चाह रहे हैं कि परम परमात्मा का स्वरूप करोड़ों सूर्यों  के चराचर संसार के ज्ञान से कहीं अधिक है क्योंकि परमात्मा परम ज्ञान स्वरूप हैं। सृष्टि का कोई भी ज्ञान परम ज्ञान के मुकाबले शायद ही हो।

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ।13।

हे राजन्, पाण्डु पुत्र अर्जुन ने भिन्न भिन्न जगत और उसके भिन्न भिन्न प्राणियों को भगवान श्री कृष्ण चन्द्र के आत्म रूप में एक जगह स्थित देखा।

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ।14।

आत्म स्वरूप के अन्दर भिन्न भिन्न चर अचर समूहों को जो भिन्न भिन्न आकृति वर्ण वेश के थे, अत्यन्त आश्चर्य से अर्जुन द्वारा देखा गया और वह श्री भगवान के दिव्य विश्वात्मा शरीर को परम श्रद्धा से अपने सम्पूर्ण ज्ञान के साथ प्रणाम करके, हाथ जोड़कर कहने लगे।

अर्जुन उवाच

पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्‍घान्‌ ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्‌ ।15।

अर्जुन बोले, हे भगवन आपके इस आत्म स्वरूप में मैं सभी  देवताओं को, समस्त चर अचर संसार को, कमल के आसन पर विराजमान ब्रह्मा को अर्थात अनाहत चक्र में स्थित जीवात्मा स्वरूप को, महादेव परम शिव को अर्थात आज्ञा चक्र में स्थित महाबुद्धि स्वरूप आत्मा को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ अर्थात प्रत्येक प्राणी में चाहे वह महान ऋषि अथवा निम्न योनी के सर्प हों सब में दिव्य आत्मा के दर्शन करता हूँ।

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्‌ ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ।16।

हे सम्पूर्ण विश्व के परम स्वामी आपके आत्म रूप के अन्दर मैं अनके जीवों को, जो अनेक भुजा वाले, अनेक पेट वाले, अनेक मुख और नेत्रों से युक्त हैं, भिन्न भिन्न रूपों के भिन्न भिन्न प्राणियों को देखता हूँ। हे विश्वात्मन, आपके स्वरूप का न अन्त है, न मध्य है, न आदि है। सर्वत्र, आपका यह आत्मरूप ही व्याप्त है।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्‌ ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं
समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्‌ ।17।

श्री भगवान के विराट दर्शन करते समय अर्जुन सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि की बीच की स्थिति में थे और वह श्री भगवान के आत्म स्वरूप और मानवीय स्वरूप दोनों की अनुभूति कर रहे थे और उनके मानवीय स्वरूप के दर्शन भी उस आत्म स्वरूप के अन्दर करते हुए कहते हैं, हे भगवन, मैं आपको मुकुट युक्त, गदा धारण किये हुए, चक्र युक्त सब ओर से परम आभामय तेज पुंज प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान ज्योति‍‌ युक्त देखता हूँ। परम आभामय होने के कारण आपको देखना भी कठिन हो रहा है। अतः आपके अद्वितीय नर हरि स्वरूप को मैं बड़ी कठिनता से देखता हूँ।

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ।18।

हे परम परमात्मा आप अक्षर हैं अर्थात आप नाश रहित परम सत् हैं। आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं अर्थात कल्पान्त में सम्पूर्ण सृष्टि प्रकृति के साथ आपमें ही विलीन होती है और पुनः आप से ही जन्म लेती है। आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं अर्थात आत्म स्वभाव को स्थापित करने के लिए आप अपनी इच्छा से देह धारण करते हैं, स्वभाव का आदि कारण भी आप ही हैं; आप अविनाशी सनातन पुरुष हैं अर्थात आपका न कोई आदि है, न मध्य है, न अन्त है।

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्‌ ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्‌ ।19।

हे विश्वात्मन, आप आदि, अन्त और मध्य से रहित हैं। महामाया भी आप में स्थान पाती है। आप अनन्त सामर्थ से युक्त हैं अर्थात परम शुद्ध ज्ञान स्वरूप होने के कारण जड़ को चेतन और चेतन को जड़ करने में आप ही समर्थ हैं। आप विश्वात्मा होकर अनेक भुजा वाले हैं, सूर्य चन्द्र आपके नेत्र हैं अर्थात ज्ञान ही आपका नेत्र है प्रज्वलित अग्नि मुख से आप इस जगत को तप्त कर रहे हैं।

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदंलोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्‌ ।20।

हे महात्मन् पृथ्वी और अंतरिक्ष के बीच में चारों ओर और सम्पूर्ण दिशाएं आपके महाकाल स्वरूप आत्म रूप ने ही परिपूर्ण कर रक्खी हैं, आपके इस अलौकिक और उग्र स्वरूप को तीनों लोक सहन नहीं कर पा रहे हैं अर्थात आपके आत्म स्वरूप को धारण करने की तीनों लोकों में किसी में शक्ति नहीं है।

अमी हि त्वां सुरसङ्‍घा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्‍घा:
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ।21।

सम्पूर्ण देवता गण आपके आत्म स्वरूप में ही स्थित हैं, कई आपके महाकाल स्वरूप को देखकर भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपका गुणगान कर रहे हैं। परम ज्ञान को प्राप्त महर्षि और सिद्धों का समूह आपके स्वरूप को देखकर परम आनन्दित है और वह स्वस्ति वचन और उत्तम-उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गंधर्वयक्षासुरसिद्धसङ्‍घावीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ।22।

हे परम आत्मन्, ग्यारह रूद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, साध्य, विश्वदेव, अश्विनी कुमार, उन्चास मरुतगण, पितृ ब्राह्मण, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सिद्ध आदि सभी दिव्य पुरुष आपके महाकाल स्वरूप को विस्मित होकर देख रहे हैं।

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरूपादम्‌ ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालंदृष्टवा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्‌ ।23।

हे विश्वात्मन् मैं देख रहा हूँ कि सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त आप ही बहुत मुख वाले, नेत्रों वाले, बहुत जंघा और पैरों वाले, बहुत पेट वाले, बहुत सी विकराल दाढों वाले होकर अनेक रूपों में व्याप्त हैं। आपको देखकर सभी लोक व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हूँ क्योंकि श्री भगवान का काल रूप अत्यन्त भयानक था।

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्‌ ।
दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ।24।

हे विष्णो, विश्व के अणु अणु में व्याप्त हे ईश्वर, आपका स्वरूप आकाश को स्पर्श कर रहा है, परम आभामय है। आपका विश्वात्मा स्वरूप अनेक वर्णों से युक्त है, आपके फैलाये हुए मुख और दीप्त विशाल नेत्रों को देखकर मेरा चित्त स्थिर नहीं है और मैं न धैर्य रख पा रहा हूँ और मेरे मन में हलचल मची हुई है क्योंकि युद्ध भूमि में श्री भगवान काल रूप में प्रकट हुए थे।

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्टैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास ।25।

हे विष्णो, विश्व के अणु अणु में व्याप्त हे ईश्वर, आपका स्वरूप आकाश को स्पर्श कर रहा है, परम आभामय है। आपका विश्वात्मा स्वरूप अनेक वर्णों से युक्त है, आपके फैलाये हुए मुख और दीप्त विशाल नेत्रों को देखकर मेरा चित्त स्थिर नहीं है और मैं न धैर्य रख पा रहा हूँ और मेरे मन में हलचल मची हुई है क्योंकि युद्ध भूमि में श्री भगवान काल रूप में प्रकट हुए थे।

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ।26।
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्‍गै ।27।

हे महाकाल, मैं देख रहा हूँ हमारे ज्येष्ठ पिता महाराजा धृतराष्ट्र के पुत्र, राजाओं का समुदाय आप में प्रवेश कर रहा है, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धा और अनेक सैनिक आपके विकराल दाढ़ों वाले भयानक मुख में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक, अपने सिरों सहित आपके विकराल दाढ़ों से चबाकर चूर्ण किये दातों के बीच में लगे हुए दिखाई दे रहे हैं।

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ।28।

बहुत से योद्धा आपके मुख की ओर वैसे ही जा रहे हैं जैसे नदियाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं। इस पृथ्वी के अनेक वीर आपके विकराल मुख में, जो अग्नि के समान प्रज्वलित है, प्रवेश कर रहे हैं।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति
लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ।29।

जैसे पतंगे नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अत्यन्त वेग से उड़ते हुए प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार यह कौरव और अनेक योद्धा भी अपने नाश के लिए आपके मुख में अति वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं ।

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ।30।

हे महाकाल आप सम्पूर्ण लोकों को अपने तेजोमय मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे परमात्मा, हे विष्णु, महाकाल के रूप में आपका यह उग्र प्रभामय स्वरूप सम्पूर्ण जगत को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्‌ ।31।

हे विश्वात्मा, हे भगवन कृपा कर बतलाइये परम उग्र रूप वाले आप कौन हैं? हे देवताओं में श्रेष्ठ आपको नमस्कार है, आप प्रसन्न हों। हे आदि पुरुष मैं आपको जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को  नहीं जानता।

श्रीभगवानुवाच

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ।32।

अर्जुन के पूछने पर श्री भगवान बोले मैं लोकों का नाश करने वाला बढा हुआ काल अर्थात महाकाल हूँ इस समय इन योद्धाओं को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ इसलिए प्रतिपक्ष में जो योद्धा लोग इस युद्ध भूमि में हैं वह सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे, तू यह जान ले कि उनकी मृत्यु निश्चित है।

तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून्भुङ्‍क्ष्व राज्यं समृद्धम्‌ ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌ ।33।

अतः हे अर्जुन तू युद्ध के लिए उठ खड़ा हो और मेरे द्वारा मारे हुए इन प्रतिपक्षी योद्धाओं को मारने के लिए निमित्त मात्र बन जा। इन मेरे द्वारा  मारे हुओं को मारकर तू यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धनधान्य से सम्पन्न राज्य को भोग।

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्‌ ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्‌ ।34।

द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और भी बहुत से मेरी महाकाल प्रकृति द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार। हे अर्जुन अब किस बात का भय तूने वास्तविकता देख ली है, युद्ध का परिणाम देख लिया है अतः तू युद्ध कर क्योंकि तू वैरियों को जीतेगा

संजय उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णंसगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ।35।

संजय बोले हे राजन् भगवान श्री कृष्ण चन्द्र जो महाकाल रूप में युद्ध भूमि में उपस्थित थे, के इस वचन को सुनकर अर्जुन हाथ जोड़कर भय से कांपता हुआ बार बार प्रणाम करके श्री भगवान के प्रति गदगद वाणी से बोला।

अर्जुन उवाच

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्‍घा: ।36।

हे अन्तर्यामी, हे आत्म स्वरूप परमात्मा, आपके नाम-गुण और प्रभाव के वर्णन से यह जगत अत्यन्त हर्षित हो रहा है और आपके प्रति प्रेम भी बढ़ रहा है परन्तु आपके महाकाल स्वरूप को देखकर राक्षस भयभीत होकर भिन्न भिन्न दिशाओं में भाग रहे हैं और निश्चयात्मक बुद्धि वाले सिद्ध गण आपको नमस्कार कर रहे हैं।

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌ ।37।

हे आत्मदेव, आप पितामह ब्रह्मा के भी आदि कर्ता अर्थात पिता हैं। आप जीवात्मा के पिता परमात्मा हैं अतः सबसे परम होने के कारण आपको कैसे न प्रणाम किया जाय। हे विश्वरूप में व्याप्त, हे अनन्त, हे देवताओं के स्वामी, हे जगत के स्वामी, आप सत् असत् से परे, नाश न होने वाले निश्चित परब्रह्म परमात्मा हैं।

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।38।

हे भगवन, आप समस्त देवताओं के आदि हैं, आप ही अनादि पुरुष हैं। आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं अर्थात व्यक्त और अव्यक्त प्रकृति आप ही में स्थान पाती है। आप जानने वाले और जानने योग्य हैं क्योंकि आप पूर्ण विशुद्ध ज्ञान हैं अतः आपसे कहीं भी कुछ भी नहीं छिपा है और जानने योग्य भी आप ही हैं क्योंकि आप ही परम सत् हैं, आपके अलावा सब नाशवान होने के कारण, उनके जानने का कुछ भी प्रयोजन नहीं है। आप परम धाम हैं अर्थात आप ही परम स्थिति हैं और हे अनन्त रूप, हे विश्वात्मन, आपसे यह जगत परिपूर्ण है।

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्‍क:
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ।39।

हे विश्वात्मन, आप ही वायु हैं, आप ही यमराज हैं, अग्नि, वरूण, चन्द्रमा, प्रजापति, ब्रह्मा और ब्रह्मा जी के पिता भी आप ही हैं। आपको हजारों हजारों बार नमस्कार है। आपको फिर बार बार नमस्कार है।

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं
समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ।40।

हे अनन्त शक्ति सम्पन्न आत्मदेव, आपको आगे से भी नमस्कार है, आपको पीछे से भी नमस्कार है, हे विश्वात्मन आपको सब ओर से नमस्कार है। हे अनन्त पराक्रमशाली श्री भगवान आप सम्पूर्ण संसार के कण कण को व्याप्त किये हुए हैं, इसलिए प्रत्येक रूप आप ही का है।

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि ।41।
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्‌ ।42।

हे आत्मदेव, हे भगवन, मैं आपके परम योग ऐश्वर्य युक्त आत्म स्वरूप के प्रभाव को नहीं जानता था इसलिए मेरे द्वारा आपको हे सखा मानकर प्रेम से अथवा बुद्धि भ्रम से हे कृष्ण, हे सखा, हे यादव इस प्रकार सोचे विचारे और हठ पूर्वक कहा गया। हे अच्युत मेरे द्वारा विनोद के समय, विहार करते हुए, सोते हुए, बैठते हुए, भोजन आदि करते हुए, अकेले में अथवा मित्र और सम्बन्धियों के सामने, आपको कृष्ण, यादव, सखा शब्दों से अपमानित किया गया। हे अप्रमेय स्वभाव वाले, हे विश्व देव, मैं आपके प्रभाव को नहीं जानता था इसलिए हे परमात्मा और  मैं आपसे अपने अपराध की क्षमा चाहता हूँ, अपने अपराधों को क्षमा करवाता हूँ

पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्‌।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव।43।

हे विश्वात्मन आप इस चराचर जगत के पिता हैं और परम श्रेष्ठ गुरु भी आप ही हैं, आप अति पूज्यनीय हैं, तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं है, आप अनुपम प्रभाव वाले हैं, फिर आपसे अधिक दूसरा कौन और कैसे हो सकता है।


तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्‌।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्‌ ।44।

हे परमात्मा, हे स्तुति के योग्य हे ईश्वर, आपको प्रसन्न होने के लिए मैं दण्डवत प्रणाम करके प्रार्थना करता हूँ। हे आत्म देव, हे परमदेव, पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के, पति जैसे अपनी प्रिया के अपराध को सहन कर लेता है और क्षमा कर देता है उसी प्रकार हे प्रभु, आप मेरे अपराधों को सहन करते हुए क्षमा कीजिए।

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास ।45।

हे आत्मदेव, आपके पहले न देखे हुए योग ऐश्वर्य स्वरूप जो इस युद्ध भूमि में महाकाल प्रकृति को लेकर सर्वत्र व्याप्त हैं, मैं देखकर हर्षित हो रहा हूँ परन्तु मेरा मन आपके महाकाल स्वरूप के कारण व्याकुल भी हो रहा है। इसलिए हे प्रभु कृपा कर मुझे अपने दिव्य नर हरि रूप को दिखलाइये। हे देवताओं के स्वामी, हे जगत के स्वामी, मुझ पर प्रसन्न हों।

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेनसहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ।46।

हे प्रभु, मैं आपको मुकुट धारण किये हुए और हाथ में गदा और चक्र लिए हुए देखना चाहता हूँ इसलिए हे विश्व रूप, हे अनन्त भुजा वाले भगवन, कृपा कर नर हरि (चर्तुभुज) रूप में प्रकट होइये।

श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात्‌ ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यंयन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्‌ ।47।

इस प्रकार अर्जुन की विनय सुनकर श्री भगवान बोले-हे अर्जुन, मैंने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपनी योग शक्ति के प्रभाव से अपना परम ज्ञान व सीमा रहित, सबका कारण, सबका आदि, विराट स्वरूप तुझे दिखलाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया।

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।
एवं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ।48।

हे अर्जुन, इस पृथ्वी लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मेरा विराट स्वरूप न वेदों के अध्ययन से, न दान से, न भिन्न-भिन्न प्रकार की ईश्वर निमित्त क्रियाओं से, न उग्र तपों से, तेरे अलावा दूसरे के द्वारा देखा जाना शक्य नहीं है।

मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्‍ममेदम्‌।
व्यतेपभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वंतदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ।49।

मेरे इस विराट और विकराल स्वरूप को देखकर तुझे व्याकुलता नहीं होनी चाहिए और तुझे मूढ़ भाव भी नहीं होना चाहिए। तू भय रहित और अति प्रेम युक्त मन से मेरे उसी नर हरि श्री कृष्ण स्वरूप को फिर से देख।

संजय उवाच

इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनंभूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ।50।

संजय बोले हे राजन्, वासुदेव भगवान श्री कृष्ण चन्द्र ने, अर्जुन के प्रति यह कर अपना नर हरि स्वरूप दिखलाया और इस प्रकार भयभीत अर्जुन को श्री कृष्ण महाराजा ने धीरज दिया।

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ।51।

अर्जुन बोले, हे भगवन आपके अति शान्त मनुष्य, नर हरि स्वरूप को देखकर मैं स्थित चित्त हो गया हूँ और अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया हूँ।

श्रीभगवानुवाच

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्‍क्षिणः ।52।

श्री भगवान बोले हे अर्जुन, मेरा यह नर हरि स्वरूप भी अत्यन्त दुर्लभ है। देवता भी इस मनोहारी स्वरूप को देखने की सदा इच्छा करते रहते हैं परन्तु यह स्वरूप उनके लिए भी दुर्लभ है।

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा ।53।

हे अर्जुन, जिस प्रकार तूने मेरा योग ऐश्वर्य युक्त विराट स्वरूपको देखा और अब नर हरि स्वरूप को देख रहा है, मेरे यह दोनो स्वरूप न वेद ज्ञान से, न तप से, न दान से, न यज्ञ से देखे जा सकते हैं।

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ।54।

परन्तु हे अर्जुन जो मेरा अनन्य भक्त है, जो तेरे समान ही मुझे प्रिय है ऐसे प्रिय भक्त द्वारा ही मेरा विभूतिमय विराट स्वरूप और मेरा नर हरि स्वरूप प्रत्यक्ष देखने के लिए शक्य है। मेरा अनन्य प्रेमी ही मुझे तत्व से जान सकता है और वही मुझमें प्रवेश पा सकता है अर्थात आत्म स्वरूप होना, ब्राह्मी स्थिति को पाना, मेरे अनन्य प्रेमी के लिए ही संभव है।

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ।55।

श्री भगवान द्वारा यहाँ  पुनः बताया है कि मेरा आत्म स्वरूप अनन्य भक्ति से अर्थात जो निरन्तर स्वरूप स्थिति की खोज करता हुआ आत्मरत रहता है, जो मुझे विश्वात्मा भाव से देखता है, मैं आत्मा उसी के लिए सुलभ हूँ क्योंकि उसके सभी कर्म मेरे लिए होते हैं। सदा मुझमें आत्मरत हुआ वह संसार की ओर से नित्य उदासीन रहता है। उसका संसार में न कोई मित्र है न शत्रु है। सम्पूर्ण प्राणी उसे मेरा ही स्वरूप दिखायी देते हैं, उसका वैर भाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार वह सदा-सदा के लिए आत्म ज्ञान को प्राप्त हो जाता है जहाँ अज्ञान का अंश भी नहीं है और अक्षय शान्ति, आनन्द एवं ज्ञान का श्रोत ब्रह्म स्वरूप हो जाता है।
यहाँ  एक महत्वपूर्ण बात श्री भगवान ने बतायी है, मेरे मानवीय शरीर का सानिध्य एवं दर्शन भी सबके लिए सुलभ नहीं है। इसे भी केवल वही व्यक्ति देख पाता है अर्थात मेरा (मेरे मानवीय शरीर का) सानिध्य भी उसे ही मिलता है जो मेरे लिए ही अर्थात आत्मा के लिए निष्काम कर्म करता है, आत्मरत है (मेरा भक्त है), समस्त प्राणियों से वैर भाव से रहित है क्योंकि सभी में वह आत्म स्वरूप के दर्शन करता है। यह बताते हुए श्री भगवान ने यह संकेत किया है कि इस संसार में ब्रह्म ज्ञानी का दर्शन भी सबके लिए सुलभ नहीं है। उसका सानिध्य केवल स्वाभाविक कर्म करते हुए धर्माचरण करने वाला, सदा आत्म ज्ञान के लिए लालायित अनेक जन्मों का योगभ्रष्ट पुरुष ही प्राप्त करते हैं।


ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः ११

                              .....................................

No comments:

Post a Comment