Friday, September 16, 2011

आत्मगीता - अध्याय ६ -आत्मसंयम योग (हिन्दी भाष्य )



तू यह समझ ले कि तू ही परम ज्ञान स्वरूप शुद्ध  चैतन्य आत्मा है और तुझ में ही स्वयं सामर्थ है कि तू अपना उद्धार करे। अपने को अधोगति की ओर न ले जा।
अग्नि का त्याग करने वाला अर्थात गृहस्थ धर्म को चूल्हा चौके के झंझट से छोड़ने वाला सन्यासी नहीं है.

श्रीभगवानुवाच                             

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ।1।

श्री भगवान बोले:- हे अर्जुन कर्म फल की इच्छा न करते हुए जो पुरुष कर्म करता है वह सन्यासी है तथा वही कर्म योगी है अर्थात कर्म योगी और सन्यासी (ज्ञानी) एक ही हैं। केवल अग्नि का त्याग करने वाला अर्थात गृहस्थ धर्म को चूल्हा चौके के झंझट से छोड़ने वाला सन्यासी नहीं है और जिसने हठ पूर्वक क्रियाएँ अर्थात कर्तव्य कर्म छोड़ दिये हैं और मन से उनका स्मरण करता हुआ आडम्बर पूर्ण व्यवहार करता है वह कर्म योगी नहीं है।

यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्‍कल्पो योगी भवति कश्चन ।2।

हे अर्जुन, जिसको सन्यास अथवा ज्ञान कहते हैं उसी को तू कर्म योग जान। परन्तु जिसने संकल्प अर्थात इच्छाओं का त्याग नहीं किया हो ऐसा कोई भी पुरुष योगी नहीं हो सकता है अर्थात जो कामना रहित है वही ज्ञानी है, वही अनासक्त होकर कर्म करता हुआ कर्म योगी है।

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ।3।

जो पुरुष योगारूढ़ होना चाहता है उसके लिए बुद्धि द्वारा
निरन्तर निष्काम होकर, कर्म हेतु हैं। योगारूढ़ होने के लिए विभिन्न साधन पद्धतियों में भिन्न भिन्न प्रकार के कर्म बताए हैं। महर्षि पातंजलि ने आष्टांग योग का विस्तार से वर्णन किया है। भगवान श्री कृष्ण चन्द्र जी ने योगारूढ़ होने के लिए कुछ विधान बताये हैं:-
1 - आसन न अधिक ऊँचा न नीचा।
2 - सिर गरदन और शरीर को एक सीध में रखते हुए अन्य दिशा को न देखते हुए नासिका के अग्रभाग को देखते रहना। इस प्रकार मन को शान्त करना।
3 - तत्पश्चात प्राणों को भौहों के मध्य ले जाना।
4 ऊँ ही परमात्मा का नाम है, व्यवहार में उसका स्मरण करना।
जब ऐसा अभ्यासी पुरुष योगारूढ़ हो जाता है तो उसके सभी संकल्पों का अभाव हो जाता है और उसके सभी संकल्पों का अभाव कल्याण का हेतु है।

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ।4।

हे अर्जुन, योगारूढ़ पुरुष के लक्षण सुन। जिस व्यक्ति को परम ज्ञान हो जाता है वह इन्द्रिय भोगों व कर्मों में आसक्त नहीं होता है संसार में उदासीन वत विचरता है, उसके सभी संकल्प समाप्त हो जाते हैं।

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।5।

तू यह समझ ले कि तू ही परम ज्ञान स्वरूप शुद्ध  चैतन्य आत्मा है और तुझ में ही स्वयं सामर्थ है कि तू अपना उद्धार करे। अपने को अधोगति की ओर न ले जा। अपने को शरीर मत समझ। अपने चिन्तन को को शरीर और  इन्द्रियों की ओर अपने को ले जाना अधोगति है। यह समझ ले तेरा चिन्तन ही तेरा शत्रु  है, तेरा चिन्तन ही तेरा मित्र है।

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌ ।6।

जिस जीवात्मा ने मन बुद्धि चित्त अंहकार सहित इन्द्रियों व शरीर को जीत लिया है, जिसके वश में उसका मन व इन्द्रियाँ हैं, ऐसा अहंकार रहित आत्मा स्वयं अपना मित्र है परन्तु जो अनात्म वस्तुओं की ओर आसक्त है, मन इन्द्रियों सहित शरीर जिसके वश में नहीं है वह स्वयं अपने लिए शत्रु  के रूप में बरतता है। मैं शरीर हूँ यही स्थित भाव शत्रुता है, मैं आत्मा हूँ यही स्थित भाव मित्रता है।

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ।7।

जिसने अपने मन को जीत लिया है, जिसकी वासनायें भलीभांति शान्त हो गयी हैं, जो परमात्मा में पूर्ण रूपेण स्थित हो चुका है, जिसे सभी कुछ ब्रह्ममय भासित होता है, ऐसे महात्मा पुरुष को सरदी गरमी, सुख दुख, मान अपमान आदि द्वन्द्व का आभास मात्र तक नहीं होता क्योंकि वह स्वरूप स्थिति में सदा निमग्न रहता है।

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः ।8।

स्वरूप स्थित योगी का अन्तः करण सदा ज्ञान विज्ञान से तृप्त रहता है, ऐसा इन्द्रिय जयी पुरुष जो विकार रहित है, उसके लिए मिट्टी, पत्थर, स्वर्ण सब एक समान हैं क्योंकि वह सदा ब्राह्मी  स्थिति से युक्त है।


सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ।9।

जो संसार के समस्त प्राणियों में चाहे वह सुहृद,मित्र, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी, बन्धु, धर्मात्मा या पापी हो, वह आत्म स्थित योगी जो सदा सम भाव रखता है, अत्यन्त श्रेष्ठ है। वह संसार को अपना स्वरूप समझता है। उसके लिए कौन मित्र और कौन बैरी। सभी को नारायण स्वरूप स्वीकार करते हुए वह स्वयं नारायण स्वरूप है।

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ।10।

भगवान श्री कृष्ण चन्द्र, अर्जुन को योग साधन का उपदेश देते हुए कहते हैं; अपने चित्त को वश में करके, सभी आशाओं का त्याग कर संग्रह रहित होकर योगी अकेला ही एकान्त स्थान में रहते हुए आत्मा में स्वयं को स्थित करे।

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌ ।11।

साधना के लिए शुद्ध स्थान होना चाहिए। शुद्ध  स्थान से तात्पर्य है जहां के कम्पन अत्याधिक शुद्ध  और प्रभावशाली हो। यदि किसी योगी अथवा संत की तपस्थली रहा हो तो बहुत अच्छा। वैराग्य वहां स्वाभाविक रूप से जाग्रत हो जाता है। वहाँ कुश, मृगछाला अथवा गरम वस्त्र विछाये । वह स्थान न बहुत  ऊँचा हो न नीचा । वहाँ अपने आसन को स्थिर करके ध्यान के लिए बैठे।

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ।12।

वहाँ स्थित होकर आसन में बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में करते हुए मन को एकाग्र करे। इस प्रकार अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योगाभ्यास करे।

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌ ।13।

शरीर, सिर और गले को एक सीध में अचल रूप से स्थित रक्खे और नासिका के अग्र भाग में द्रष्टि जमाये तथा किसी भी दिशा और जगह में अपनी द्रष्टि न डाले।

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ।14।

ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होकर भय रहित शान्त अन्तःकरण वाला योगी पुरुष मन को रोककर मुझमें अपना चित्त स्थापित करते हुए स्वरूप स्थिति में स्थित होए।

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ।15।

जिसका मन उसके वश में है ऐसा योगी आत्मा को अपने स्वरूप में स्थित करता हुआ, परमात्म लाभ से प्राप्त होने वाली परम शान्ति को प्राप्त होता


नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ।16।

यह योग न बहुत खाने वाले का और न बिल्कुल खाने वाले का तथा न बहुत शयन करने वाले का न अधिक जागने वाले का सिद्ध होता है। अर्थात सोना जागना, खाना पीना नियमित होना चाहिए तभी योग का अधिकारी होता है।

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।17।

जिसका आहार-विहार, चेष्टाएं, कर्म, जागना-सोना सभी यथा योग्य हैं, ऐसे संयमित पुरुष का दुखों का नाश करने वाला योग सिद्ध होता है।

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ।18।

लगातार साधना से वश में किया हुआ चित्त जब स्वरूप में स्थित हो जाता है उस समय सभी विषय वासनाओं से योगी उदासीन हो जाता है। उसमें कोई कामना नहीँ  रहती, वह आत्म तृप्त हुआ आत्म स्थित रहता

यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ।19।

योगी जिसने अपने चित्त को आत्मा के साथ तदाकार कर लिया है, उसका चित्त फिर चंचल नहीं होता। वह उस दीपक की तरह स्थिर हो जाता है, जिसकी लौ वायु रहित स्थान में अचल रहती है। संसार की विषय वासनाएं उसके चित्त को चंचल नहीं कर पाती हैं।

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ।20।

योग के अभ्यास वश में किया हुआ चित्त जिस समय आत्मा में अच्छी प्रकार स्थित होता है उस समय सभी कामनाओं से मुक्त इच्छा रहित योगी पुरूष आत्म स्थित हो जाता है। चित्त स्वयं आत्म रूप हो जाता है और सदा स्वरूप स्थिति में निमग्न रहता है।


सुखमात्यन्तिकं यत्तद्‍बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्‌ ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ।21।

यहाँ श्री भगवान अर्जुन को उपदेश देते हुए परम उत्तम रहस्य बताते हैं। आत्मतत्व केवल सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा ही जाना जा सकता है। बुद्धि के अलावा परमात्मा को पाने का अन्य कोई उपाय नहीं है। यदि अन्य उपाय जो बताये जाते हैं वह सभी बुद्धि के सहारे ही बढ़ते हैं। यह बुद्धि जो इन्द्रियों से अत्याधिक बलशाली है जब सूक्ष्म होकर निश्चित हो जाती है तब वह स्वयं महाबुद्धि में विलीन हो जाती है। वह महाबुद्धि ही अत्यन्त आनन्द हैं। महाबुद्धि को प्राप्त योगी स्वरूप स्थित होकर विचलित नहीं होता है।

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ।22।

स्वरूप स्थिति को पाकर वह परम लाभ को प्राप्त हो जाता है। फिर उससे अधिक इस सृष्टि में दूसरा लाभ उसे कुछ भी नहीं दिखायी देता। आत्मतत्व स्थित योगी बड़े से बड़े दुःख से विचलित नहीं होता क्योंकि सुख दुःख उसके लिए समान हो जाते हैं।

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।23।

योग को अवश्य जानना चाहिए। योग ही ऐसा माध्यम है जो दुख रूपी संसार के संयोग से रहित है। यह योग निश्चय पूर्वक करना चाहिए। योग धैर्य रखते हुए करना चाहिए, उकताया हुआ चित्त विचलित हो जाता है, अतः धैर्य परम आवश्यक है।

सङ्‍कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ।24।

संकल्प के प्रभाव से उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को पूर्ण रूप से त्यागकर मन के द्वारा सभी इन्द्रियों को सब ओर से अच्छी प्रकार रोके।

शनैः शनैरुपरमेद्‍बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌ ।25।

इस क्रम से अभ्यास करता हुआ जब मन विषयों से स्वतः उपराम हो जाता है अर्थात विषयों की ओर भागना बन्द कर देता है तब धैर्य युक्त होकर बुद्धि द्वारा मन को आत्मा में स्थित कर कुछ भी चिन्तन न करे।

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌ ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌ ।26।

यह स्थिर न रहने वाला चंचल मन जिस विषय में जाता है वहाँ से बार बार इसे हटा कर, स्वरूप चिन्तन में लगाये मन अपने स्वभाव व रुचि के कारण विषय की ओर भागता है। बार-बार आत्म चिन्तन में लगाने से उसका स्वभाव व रुचि विषय में हटकर आत्म चिन्तन की ओर लग जाती है अतः निरन्तर दृष्टा होकर अभ्यास करना है।

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌ ।
उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌ ।27।

इस प्रकार जिसके मन का भटकना बन्द हो गया है अर्थात चित्त स्थिर  होकर शान्त हो गया है, ऐसे योगी को अक्षय आनन्द प्राप्त होता है। स्वरूप स्थित ऐसे योगी के सभी कर्म क्षय हो जाते हैं। वह मन के शान्त होते ही अनासक्त हो जाता है। यही नहीं मन शान्त होते ही उसका रजोगुण शान्त हो जाता है और सहज समाधि का वह अनुभव करता है।

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ।28।

जिसके सभी कर्म क्षय हो गये हैं ऐसा स्वरूप स्थित योगी स्वयं ब्रह्म लाभ करते हुए ज्ञान को प्राप्त होता है। परम ज्ञान को प्राप्त कर वह स्वतः परम शान्ति, परम आनन्द का अनुभव करता है।

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ।29।

जो आत्मा से एक रूप हो चुका हो अर्थात स्वरूप स्थित योगी सभी में समभाव रखता हुआ सभी प्राणियों में स्वयं को स्थित देखता है तथा सभी प्राणियों को स्वयं में स्थित देखता है अर्थात सभी भूतो से तदाकार हो जाता है और तत्काल ब्रह्म स्वरूप हो समस्त सृष्टि में व्याप्त हो जाता है।

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ।30।

विश्वात्मा हुआ वह योगी सभी में आत्म रूप से स्थित मुझे देखता है और सभी को मुझ विश्वात्मा के अन्दर समाहित देखता है। आत्म रूप हुए ऐसे योगी के लिए मैं विश्वात्मा अदृश्य नही हूँ और वह मुझ विश्वात्मा के लिए अदृश्य नहीं है अर्थात हम दोनों एक हो जाते हैं। वह आत्म स्थित योगी ही विश्वात्मा हो जाता है। यहीं अन्तिम ब्राह्मी स्थिति है। यही योग का अन्तिम फल है।

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ।31।

जो योगी एकीभाव से स्थित होकर सभी प्राणियों में मुझ विश्वात्मा का दर्शन करता है, मुझे स्मरण करता है वह योगी शरीर में होते हुए भी देह और कर्म बन्धन से मुक्त हुआ स्वयं विश्वात्मा बन जाता है।

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ।32।

जो सभी भूतों को अपने समान ही मानता है क्योंकि सभी में वह स्वरूप स्थिति के ही दर्शन करता है। संसार के सभी सुख दुख को समान समझता है, वह योगी परम श्रेष्ठ है। उसमें और मुझमें कुछ भी अन्तर नहीं रहता क्योंकि वह विश्वात्मा हो जाता है।

अर्जुन उवाच

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्‌ ।33।

महात्मा अर्जुन श्री भगवान से कहते हैं:-
हे मधुसूदन, जो आपने यह समत्व योग मुझे बताया है इसे मैं मन की चंचल स्थिति होने के कारण इसकी नित्य स्थिति अर्थात इसका ठहरना नहीं देखता हूँ, क्योंकि यह इन्द्रियों को बहा ले जाता है, बुद्धि को भ्रम में डाल देता है, यह एक प्रेत की तरह है जो हर समय हर दिशा में दौड़ता है।

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌ ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌ ।34।

इसी क्रम में अर्जुन कहते हैं:-
यह मन बहुत ही ताकतवर है, बड़ा हठी है, अत्यन्त बलवान है और कोई इसकी बात न माने उसे यह बड़ा दुखी कर देता है। ऐसे मन को रोकना मैं वायु रोकने के समान कठिन मानता हूँ।

श्रीभगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌ ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ।35।

श्री भगवान बोले:- हे अर्जुन, जो तूने मन के विषय में कहा वह निश्चय ही सत्य है। यह मन निसंदेह चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है परन्तु यदि कोई विषय वासनाओं से वैराग्य का अभ्यास करे अथवा इसके भटकने की आदत को रोकने का अभ्यास करे तो यह वश में आ जाता है।

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ।36।

जिस पुरुष के अन्दर वैराग्य नहीं है, जो निरन्तर अभ्यास नहीं करता है, उसका मन कभी भी वश में नहीं आ सकता है। और जिसका मन वश में नहीं है उसे योग की प्राप्ति नहीं हो सकती है। जिसने निरन्तर अभ्यास और वैराग्य से अपने मन को वश में कर लिया है उस प्रयत्नशील मनुष्य के लिए साधन से योग प्राप्त होना सहज है।

अर्जुन उवाच

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ।37।

अर्जुन बोले हे देव, जो मनुष्य योग में श्रद्धा रखता है अर्थात आत्म ज्ञान चाहता है, अभ्यास करता है परन्तु संयमी नहीं है, इस कारण योग से जिसका मन विचलित हो गया है, वह स्वरूप स्थिति (योग सिद्धि) को न पाकर किस गति को प्राप्त होता है ?

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ।38।

क्या आत्म ज्ञान के मार्ग से मोहित मन के द्वारा भटकाया गया वह पुरुष दोनों ओर से भ्रष्ट तो नहीं हो जाता ? क्योंकि न वह संसार को पूर्ण रूपेण भोग पाता है और न उसे परमार्थ ही प्राप्त होता है। कहीं वह आश्रय रहित बादल की तरह दोनों ओर से नष्ट तो नहीं हो जाता?

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ।39।

हे भगवन, मेरे इस संशय को केवल आप ही नष्ट कर सकते हैं क्योंकि आप कि सिवाय दूसरा कोई भी इस संशय को नष्ट करने वाला मिलना सम्भव नहीं है। योग मार्ग में अभ्यास और वैराग्य के साथ समर्थ गुरु अथवा शास्त्र निर्देश आवश्यक हैं। शास्त्र निर्देश को सही रूप से जानना जरूरी है अन्यथा साधक दुविधा ग्रस्त ही रहता है।


श्रीभगवानुवाच

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ।40।

श्री भगवान अर्जुन से कहते हैं:- कि योग युक्त पुरुष न इस लोक में न परलोक में विनाश को प्राप्त होता है। क्योंकि जो भी आत्म ज्ञान के कल्याणकारी मार्ग में चल पड़ा वह कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता क्योंकि ब्रह्म बीज और उसका पौधा कभी भी नष्ट नहीं होता। वह एक बार पड़ गया तो जमेगा अवश्य और बढ़ेगा भी जरूर।

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ।41।

योग भ्रष्ट जीवात्मा देह त्याग के पष्चात पुण्यवानों के लोक में जाता है और वहाँ दीर्घकाल तक निवास कर पुनः शुद्ध  आचरण करने वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है।

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्‌ ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्‌ ।42।

अथवा बुद्धिमान योगियों के घर में वह योग भ्रष्ट जीवात्मा जन्म लेता है। इस प्रकार का जन्म इस संसार में निसंदेह दुर्लभ है।

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्‌ ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ।43।

योग भ्रष्ट पुरुष के पिछले जन्म के योग संस्कार कभी धीरे धीरे, कभी शीघ्र  स्वतः प्रकट होने लगते हैं और उनके प्रभाव से वह आत्म ज्ञान की ओर बढ़ता है। पूर्वजन्म से अधिक अभ्यास और वैराग्य द्वारा वह मन को रोकने का और अधिक प्रयत्न करता है क्योंकि ब्रह्म बीज का कभी नाश नहीं होता

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ।44।

वह योग भ्रष्ट पुरुष इस नवीन जन्म में माता पिता, परिवार, समाज से पराधीन हुआ भी पूर्व जन्म के अभ्यास से उसकी बुद्धि आत्म ज्ञान की ओर स्वभाववश आकर्षित होती है। वह योग का जिज्ञासु, अभ्यास एवं वैराग्य द्वारा शब्द ब्रह्म का उलंघन कर जाता है अर्थात पूर्ण ज्ञान को प्राप्त हो स्वरूप में स्थित हो जाता है।

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम्‌ ।45।

अनेक पूर्व जन्म एवं स्वभाव के कारण प्रयत्न पूर्वक योग अभ्यास करता हुआ सम्पूर्ण कर्म बन्धनों से छुटकारा प्राप्त कर परम स्थिति अर्थात स्वरूप स्थिति को प्राप्त होता है।

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ।46।

निष्काम कर्म योगी जो सदा आत्मरत है वह तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है और सकाम कर्म योगियों से भी श्रेष्ठ है। अतः हे अर्जुन तू योगी हो।


योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ।47।

निष्काम कर्म योगियों में भी जो परम श्रद्धा से युक्त होकर अनन्य रूप से सदा स्वरूप स्थिति में स्थित होकर, मुझे भजता है अर्थात मेरे विश्वात्मा स्वरूप से तदाकार कर लेता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है।
         

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः 6
         




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